+ स्वद्रव्य में रत सम्यग्दृष्टि कर्मों का नाश करता है -
सद्दव्वरओ सवणो सम्माइट्ठी हवेइ णियमेण
सम्मत्तपरिणदो उण खवेइ दुट्ठट्ठकम्माइं ॥14॥
स्वद्रव्यरतः श्रमणः सम्यग्दृष्टि भवति नियमेन
सम्यक्त्वपरिणतः पुनः क्षपयति दुष्टाष्टकर्माणि ॥१४॥
नियम से निज द्रव्य में रत श्रमण सम्यकवंत हैं ।
सम्यक्त्व-परिणत श्रमण ही क्षय करें करमानन्त हैं ॥१४॥
अन्वयार्थ : [सद्दव्वरओ] स्व-द्रव्य (अपनी आत्मा में) लीन [सवणो] श्रमण (मुनि) [णियमेण] नियम से [सम्माइट्ठी] सम्यग्दृष्टि [हवेइ] होता है और [उण] फिर [सम्मत्तपरिणदो] सम्यक्त्वभावरूप परिणमन से [दुट्ठट्ठकम्माइं] दुष्ट आठ कर्मों का [खवेइ] क्षय / नाश करता है ।

  जचंदछाबडा 

जचंदछाबडा :

यह भी कर्म के नाश करने के कारण का संक्षेप कथन है । जो अपने स्वरूप की श्रद्धा, रुचि, प्रतीति, आचरण से युक्त है वह नियम से सम्यग्दृष्टि है, इस सम्यक्त्व-भाव से परिणमन करता हुआ मुनि आठ कर्मों का नाश करके निर्वाण को प्राप्त करता है ॥१४॥