
जचंदछाबडा :
यहाँ जाननेवाला तथा देखनेवाला और त्यागनेवाला दर्शन, ज्ञान, चारित्र को कहा ये तो गुणी के गुण हैं, ये कर्त्ता नहीं होते हैं इसलिये जानन, देखन, त्यागन क्रिया का कर्त्ता आत्मा है, इसलिये ये तीनों आत्मा ही है, गुण--गुणी में कोई प्रदेशभेद नहीं होता है । इसप्रकार रत्नत्रय है वह आत्मा ही है, इस प्रकार जानना ॥३७॥ जीव, अजीव, आस्रव, बंध, संवर, निर्जरा, मोक्ष इन तत्त्वों का श्रद्धान रुचि प्रतीति सम्यग्दर्शन है, इनही को जानना सम्यग्ज्ञान है और परद्रव्यके परिहार संबंधी क्रिया की निवृत्ति चारित्र है; इसप्रकार जिनेश्वरदेव ने कहा है, इनको निश्चय--व्यवहारनय से आगम के अनुसार साधना ॥३८॥ |