
जचंदछाबडा :
मुनि भी हो और पर-जन्म संबंधी प्राप्ति का लोभ होकर निदान करे उसके परमात्मा का ध्यान नहीं होता है, इसलिये जो परमात्मा का ध्यान करे उसके इस लोक परलोक संबंधी पर-द्रव्य का कुछ भी लोभ नहीं होता है, इसलिये उसके नवीन कर्म का आस्रव नहीं होता ऐसा जिनदेव ने कहा है । यह लोभ कषाय ऐसा है कि दसवें गुणस्थान तक पहुँच जाने पर भी अव्यक्त होकर आत्मा को मल लगाता है, इसलिये इसको काटना ही युक्त है, अथवा जब तक मोक्ष की चाहरूप लोभ रहता है तब तक मोक्ष नहीं होता, इसलिये लोभ का अत्यंत निषेध है ॥४८॥ |