
जचंदछाबडा :
कोई मुनि भेषमात्र से तो मुनि हुआ और शास्त्र भी पढ़ता है; उसको कहते हैं कि-शास्त्र पढ़कर ज्ञान तो किया परन्तु निश्चय-चारित्र जो शुद्ध आत्मा का अनुभवरूप तथा बाह्य चारित्र निर्दोष नहीं किया, तप का क्लेश बहुत किया, सम्यक्त्व भावना नहीं हुई और आवश्यक आदि बाह्य क्रिया की, परन्तु भाव शुद्ध नहीं लगावे तो ऐसे बाह्य भेषमात्र से तो क्लेश ही हुआ, कुछ शांतभावरूप सुख तो हुआ नहीं और यह भेष परलोक के सुख में भी कारण नहीं हुआ; इसलिये सम्यक्त्व-पूर्वक भेष (जिन-लिंग) धारण करना श्रेष्ठ है ॥५७॥ |