+ बाह्यलिंग-सहित और अभ्यंतरलिंग-रहित मोक्षमार्ग नहीं -
बाहिरलिंगेण जुदो अब्भंतरलिंगरहियपरियम्मो
सो सगचरित्तभट्टो मोक्खपहविणासगो साहू ॥61॥
बाह्यलिंगेन युतः अभ्यंतरलिंगरहितपरिकर्म्मा
सः स्वकचारित्रभ्रष्टः मोक्षपथविनाशकः साधुः ॥६१॥
स्वानुभव से भ्रष्ट एवं शून्य अन्तरलिंग से ।
बहिर्लिंग जो धारण करें वे मोक्षमग नाशक कहे ॥६१॥
अन्वयार्थ : [बाहिरलिंगेण जुदो] बाह्य लिंग / भेष सहित है और [अब्भंतरलिंगरहिय] अभ्यंतर लिंग से रहित [परियम्मो] परिकर्म (नग्नता, ब्रह्मचर्यादि शरीर-संस्कार) होने पर भी [सो] वह [सगचरित्तभट्टो] स्व-चारित्र से भ्रष्ट होने से [मोक्खपहविणासगो साहू] मोक्षमार्ग का विनाश करनेवाला साधु है ॥६१॥

  जचंदछाबडा 

जचंदछाबडा :

यह संक्षेप से कहा जानो कि जो बाह्यलिंग संयुक्त है और अभ्यंतर अर्थात् भावलिंग रहित है वह स्वरूपाचरण चारित्र से भ्रष्ट हुआ मोक्ष-मार्ग का नाश करनेवाला है ॥६१॥