+ अभी इस पंचमकाल में धर्मध्यान होता है, यह नहीं मानता है वह अज्ञानी है -
भरहे दुस्समकाले धम्मज्झाणं हवेइ साहुस्स
तं अप्पसहावठिदे ण हु मण्णइ सो वि अण्णाणी ॥76॥
भरते दुःषमकाले धर्मध्यानं भवति साधोः
तदात्मस्वभावस्थिते न हि मन्यते सोडपि अज्ञानी ॥७६॥
भरत-पंचमकाल में निजभाव में थित संत के ।
नित धर्मध्यान रहे न माने जीव जो अज्ञानि वे ॥७६॥
अन्वयार्थ : [भरहे] भरत-क्षेत्र में [दुस्समकाले] दुःषमकाल (पंचमकाल) में, [तं अप्पसहावठिदे] आत्म-स्वभाव में स्थित [साहुस्स] साधु (मुनि) के [धम्मज्झाणं] धर्म-ध्यान [हवेइ] होता है, [ण हु मण्णइ] जो यह नहीं मानता है [सो वि अण्णाणी] वह अज्ञानी है ।

  जचंदछाबडा 

जचंदछाबडा :

जिनसूत्र में इस भरतक्षेत्र पंचमकाल में आत्मभावना में स्थित मुनि के धर्म-ध्यान कहा है, जो यह नहीं मानता है वह अज्ञानी है, उसको धर्मध्यान के स्वरूप का ज्ञान नहीं है ॥७६॥