+ मिथ्यादृष्टि के चिह्न कहते हैं -
कुच्छियदेवं धम्मं कुच्छियलिंगं च बंदए जो दु
लज्जाभयगारवदो मिच्छादिट्ठी हवे सो हु ॥92॥
सपरावेक्खं लिंगं राई देवं असंजयं वंदे
मण्णइ मिच्छादिट्ठी ण हु मण्णइ सुद्धसम्मत्तो ॥93॥
सम्माइट्ठी सावय धम्मं जिणदेवदेसियं कुणदि
विवरीयं कुव्वंतो मिच्छादिट्ठी मुणेयव्वो ॥94॥
कुत्सितदेवं धर्मं कुत्सितलिंगं च वन्दते यः तु
लज्जाभयगारवतः मिथ्यादृष्टिः भवेत् सः स्फुटम् ॥९२॥
स्वपरापेक्षं लिंगं रागिणं देवं असंयतं वन्दे
मानयति मिथ्यादृष्टिः न स्फुटं मानयति शुद्धसम्यक्त्वी ॥९३॥
सम्यग्दृष्टिः श्रावकः धर्मं जिनदेवदेशितं करोति
विपरीतं कुर्वन् मिथ्यादृष्टिः ज्ञातव्यः ॥९४॥
जो लाज-भय से नमें कुत्सित लिंग कुत्सित देव को ।
और सेवें धर्म कुत्सित जीव मिथ्यादृष्टि वे ॥९२॥
अरे रागी देवता अर स्वपरपेक्षा लिंगधर ।
व असंयत की वंदना न करें सम्यग्दृष्टिजन ॥९३॥
जिनदेव देशित धर्म की श्रद्धा करें सद्दृष्टिजन ।
विपरीतता धारण करें बस सभी मिथ्यादृष्टिजन ॥९४॥
अन्वयार्थ : [कुच्छियदेवं] कुत्सित देव (कुदेव) [धम्मं कुच्छियलिंगं च] कुत्सित धर्म (कुधर्म) और कुत्सित लिंग (कुलिंग) की [लज्जाभयगारवदो] लज्जा, भय, गारव आदि कारणों से [बंदए जो दु] जो इनकी वंदना करता है [मिच्छादिट्ठी हवे सो हु] वह प्रगट मिथ्यादृष्टि है ।
[सपरावेक्खं लिंगं] स्वपरापेक्ष (लौकिक प्रयोजन -- स्वापेक्ष, पर की अपेक्षा -- परापेक्ष) लिंग की [राई देवं] रागी देव की और [असंजयं वंदे] संयम-रहित की वंदना करे, [मण्णइ] माने, श्रद्धान करे वह [मिच्छादिट्ठी] मिथ्यादृष्टि है, [ण हु] नहीं [मण्णइ] मानता है [सुद्धसम्मत्तो] वह शुद्ध सम्यक्त्वी है ।
[सम्माइट्ठी] सम्यग्दृष्टि [सावय] श्रावक [जिणदेवदेसियं] जिनदेव से उपदेशित [धम्मं] धर्म का पालन [कुणदि] करता है [विवरीयं] विपरीत [कुव्वंतो] करे [मिच्छादिट्ठी मुणेयव्वो] उसे मिथ्यादृष्टि जानना ।

  जचंदछाबडा 

जचंदछाबडा :

जो क्षुधादिक और रागद्वेषादि दोषों से दूषि हो वह कुत्सित देव है, जो हिंसादि दोषों से सहित हो वह कुत्सित धर्म है, जो परिग्रहादि सहित हो वह कुत्सित लिंग है । जो इनकी वंदना करता है, पूजा करता है वह तो प्रगट मिथ्यादृष्टि है ।

यहाँ अब विशेष कहते हैं कि जो इनको भले / हित करनेवाले मानकर वंदना करता है, पूजा करता है, वह तो प्रगट मिथ्यादृष्टि है, परन्तु जो लज्जा भय गारव इन कारणों से भी वंदना करता है, पूजा करता है वह भी प्रगट मिथ्यादृष्टि है । लज्जा तो ऐसे कि -- लोग इनकी वन्दना करते हैं, पूजा करते हैं, हम नहीं पूंजेगे तो लोग हमको क्या कहेंगे ? हमारी इस लोक में प्रतिष्ठा चली जायगी, इस प्रकार लज्जा से वंदना व पूजा करे । भय ऐसे कि -- इनको राजादिक मानते हैं, हम नहीं मानेंगे तो हमारे ऊपर कुछ उपद्रव आ जायगा, इस प्रकार भय से वंदना व पूजा करे । गारव ऐसे कि हम बड़े हैं, महंत पुरुष हैं, सब ही का सन्मान करते हैं, इन कार्यों से हमारी बड़ाई है, इस प्रकार गारव से वंदना व पूजना होता है । इस प्रकार मिथ्यादृष्टि के चिह्न कहे ॥९२॥

स्वपरापेक्ष तो लिंग--आप कुछ लौकिक प्रयोजन मन में धारणकर भेष ले वह स्वापेक्ष है और किसी पर की अपेक्षा से धारण करे, किसी के आग्रह तथा राजादिक के भय से धारण करे वह परापेक्ष है । रागी देव (जिसके स्त्री आदि का राग पाया जाता है) और संयम-रहित को इस प्रकार कहे कि मैं वंदना करता हूँ तथा इनको माने, श्रद्धान करे वह मिथ्यादृष्टि है । शुद्ध-सम्यक्त्व होने पर न इनको मानता है, न श्रद्धान करता है और न वंदना व पूजन ही करता है ।

ये ऊपर कहे इनसे मिथ्यादृष्टि के प्रीति भक्ति उत्पन्न होती है, जो निरतिचार सम्यक्त्ववान् है वह इनको नहीं मानता है ॥९३॥

इस प्रकार कहने से यहाँ कोई तर्क करे कि -- यह तो अपना मत पुष्ट करने की पक्षपातमात्र वार्त्ता कही, अब इसका उत्तर देते हैं कि-ऐसा नहीं है, जिससे सब जीवोंका हित हो वह धर्म है ऐसे अहिंसारूप धर्म का जिनदेव ही ने प्ररूपण किया है, अन्य-मत में ऐसे धर्म का निरूपण नहीं है, इस प्रकार जानना चाहिये ॥९४॥