
जचंदछाबडा :
यहाँ ऐसा जानो कि -- लिंग ऐसा चिह्न का नाम है, वह बाह्य भेष धारण करना मुनि का चिह्न है, ऐसा यदि अंतरंग वीतराग-स्वरूप धर्म हो तो उस सहित तो यह चिह्न सत्यार्थ होता है और इस वीतराग-स्वरूप आत्मा के धर्म के बिना लिंग जो बाह्य भेषमात्र से धर्म की संपत्ति / सम्यक् प्राप्ति नहीं है, इसलिये उपदेश दिया है कि अंतरंग भाव-धर्म राग-द्वेष-रहित आत्मा का शुद्ध ज्ञान-दर्शनरूप स्वभावधर्म है उसे हे भव्य ! तू जान, इस बाह्य लिंग भेषमात्र से क्या काम है ? कुछ भी नहीं । यहाँ ऐसा भी जानना कि जिनमत में लिंग तीन कहे हैं -- एक तो मुनि का यथाजात दिगम्बर लिंग, दूजा उत्कृष्ट श्रावक का, तीजा आर्यिका का, इन तीनों ही लिंगो को धारण कर भ्रष्ट हो जो कुक्रिया करते हैं इसका निषेध है । अन्यमत के कई भेष हैं इनको भी धारण करके जो कुक्रिया करते हैं वह भी निंदा पाते हैं, इसलिये भेष धारण करके कुक्रिया नहीं करना ऐसा बताया है ॥2॥ |