+ जो लिंग धारण करके ऐसे प्रवर्तते हैं वे श्रमण नहीं हैं -
उप्पडदि पडदि धावदि पुढवीओ खणदि लिंगरूवेण
इरियावह धारंतो तिरिक्खजोणी ण सो समणो ॥15॥
उत्पतति पतति धावति पृथिवीं खनति लिंगरूपेण
ईर्यापंथ धारयन् तिर्यग्योनिः न सः श्रमणः ॥१५॥
ईर्या समिति की जगह पृथ्वी खोदते दौड़ें गिरें ।
रे पशूवत उठकर चलें वे श्रमण नहिं तिर्यंच हैं ॥१५॥
अन्वयार्थ : जो [लिंगरूवेण] लिंग रूप से [इरियावह] ईर्या-पथ [धारंतो] धारण कर भी, [उप्पडदि] उछले, [पडदि] गिर पड़े, फिर उठकर [धावदि] दौड़े और [पुढवीओ] पृथ्वी को [खणदि] खोदे, [सो] वह [समणो] श्रमण नहीं [तिरिक्खजोणी] तिर्यंच-योनि / पशु है ।

  जचंदछाबडा