
सीलगुणमंडिदाणं देवा भवियाण वल्लहा होंति
सुदपारयपउरा णं दुस्सीला अप्पिला लोए ॥17॥
शीलगुणमण्डितानां देवा भव्यानां वल्लभा भवन्ति
श्रुतपारगप्रचुरा: नं दु:शीला अल्पका: लोके ॥१७॥
शील गुण मण्डित पुरुष की देव भी सेवा करें ।
ना कोई पूछे शील विरहित शास्त्रपाठी जनों को ॥१७॥
अन्वयार्थ : जो [भवियाण] भव्यप्राणी [सीलगुणमंडिदाणं] शील और सम्यग्दर्शनादि गुण अथवा शील वही गुण उससे मंडित हैं उनका [देवा] देव भी [वल्लहा] वल्लभ / सहायक [होंति] होता है । जो [सुदपारयपउराणं] शास्त्र के पार पहुँचे हैं, ग्यारह अंग तक पढ़े हैं और [दुस्सीला] शीलगुण से रहित [णं] नहीं हैं, वे [लोए] लोक में [अप्पिला] न्यून हैं ।
जचंदछाबडा
जचंदछाबडा :
शास्त्र बहुत जाने और विषयासक्त हो तो उसका कोई सहायक न हो, चोर और अन्यायी की लोक में कोई सहायता नहीं करता है, परन्तु शीलगुण से मंडित हो और ज्ञान थोड़ा भी हो तो उसके उपकारी सहायक देव भी होते हैं, तब मनुष्य तो सहायक होते ही हैं । शील गुणवाला सबका प्यारा होता है ॥१७॥
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