+ जितने भी भले कार्य हैं वे सब शील के परिवार हैं -
जीवदया दम सच्चं अचोरियं बंभचेरसंतोसे
सम्मद्दंसण णाणं तओ य सीलस्स परिवारो ॥19॥
जीवदया दम: सत्यं अचौर्यं ब्रह्मचर्यसन्‍तोषौ
सम्यग्दर्शनं ज्ञानं तपश्च शीलस्य परिवार: ॥१९॥
इन्द्रियों का दमन करुणा सत्य सम्यक् ज्ञान-तप ।
अचौर्य ब्रह्मोपासना सब शील के परिवार हैं ॥१९॥
अन्वयार्थ : जीव-दया, [दम] इन्द्रियों का दमन, [सच्चं] सत्य, [अचोरियं] अचौर्य, [बंभचेरसंतोसे] ब्रह्मचर्य, संतोष, [सम्मद्दंसण] सम्यग्दर्शन, [णाणं] ज्ञान, [य] और [तओ] तप -- ये सब [सीलस्स] शील के [परिवारो] परिवार हैं ।

  जचंदछाबडा 

जचंदछाबडा :

शील स्वभाव तथा प्रकृति का नाम प्रसिद्ध है । मिथ्यात्वसहित कषायरूप ज्ञान की परिणति तो दु:शील है इसको संसारप्रकृति कहते हैं, यह प्रकृति पलटे और सम्यक्‌ प्रकृति हो वह सुशील है इसको मोक्षसन्मुख प्रकृति कहते हैं । ऐसे सुशील के 'जीवदयादिक' गाथा में कहे वे सब ही परिवार हैं, क्योंकि संसारप्रकृति पलटे तब संसारदेह से वैराग्य हो और मोक्ष से अनुराग हो तब ही सम्यग्दर्शनादिक परिणाम हों, फिर जितनी प्रकृति हो वह सब मोक्ष के सन्मुख हो, यही सुशील है । जिसके संसार का अंत आता है, उसके यह प्रकृति होती है और यह प्रकृति न हो तबतक संसारभ्रमण ही है, ऐसे जानना ॥१९॥