+ शील के बिना ज्ञान से ही भाव की शुद्धता नहीं होती है -
जइ णाणेण विसोहो सीलेण विणा बुहेहिं णिद्दिट्ठो
दसपुव्वियस्स भावो य ण किं पुणु णिम्मलो जादो ॥31॥
यदि ज्ञानेन विशुद्ध: शीलेन विना बुधैर्निर्दिष्ट:
दशपूर्विकस्य भाव: च न किं पुन: निर्मल: जात: ॥३१॥
यदि शील बिन भी ज्ञान निर्मल ज्ञानियों ने कहा तो ।
दशपूर्वधारी रूद्र का भी भाव निर्मल क्यों न हो ॥३१॥
अन्वयार्थ : [जइ] यदि [णाणेण] ज्ञान से [सीलेण] शील के [विणा] बिना [विसोहो] विशुद्धता [बुहेहिं] पंडितों ने [णिद्दिट्ठो] कही हो तो [पुणु] फिर [दसपुव्वियस्स] दश पूर्व को [भावो] जाननेवाले (रुद्र) के [णिम्मलो] निर्मलता [किं] क्यों [ण] नहीं [जादो] हुई ।

  जचंदछाबडा 

जचंदछाबडा :

कोरा ज्ञान तो ज्ञेय को ही बताता है, इसलिए वह मिथ्यात्व कषाय होने पर विपर्यय हो जाता है, अत: मिथ्यात्व कषाय का मिटना ही शील है, इसप्रकार शील के बिना ज्ञान ही से मोक्ष की सिद्धि होती नहीं, शील के बिना मुनि भी हो जाय तो भ्रष्ट हो जाता है । इसलिए शील को प्रधान जानना ॥३१॥