+ ऐसे अष्टकर्मों को जिनने दग्ध किये वे सिद्ध हुए हैं -
णिद्दड्‌ढअट्ठकम्मा विसयविरत्त जिदिंदिया धीरा
तवविणयसीलसहिदा सिद्धा सिद्धिं गदिं पत्त ॥35॥
निर्दग्धाष्टकर्माण: विषयविरक्ता जितेन्‍द्रिया धीरा:
तपोविनयशीलसहिता: सिद्धा: सिद्धिं गतिं प्राप्ता: ॥३५॥
जो जितेन्द्रिय धीर विषय विरक्त तपसी शीलयुत ।
वे अष्ट कर्मों से रहित हो सिद्धगति को प्राप्त हों ॥३५॥
अन्वयार्थ : जिन पुरुषों ने [जिदिंदिया] इन्द्रियों को जीत लिया है इसी से [विसयविरत्त] विषयों से विरक्त हो गये हैं, और [धीरा] धीर हैं, परिषहादि उपसर्ग आने पर चलायमान नहीं होते हैं, [तवविणयसीलसहिदा] तप, विनय, शील सहित हैं वे [णिद्दड्‌ढअट्ठकम्मा] अष्ट कर्मों को दूर करके [सिद्धिंगदिं] सिद्धगति जो मोक्ष उसको [पत्त] प्राप्त हो गये हैं, वे [सिद्धा] सिद्ध कहलाते हैं ।

  जचंदछाबडा 

जचंदछाबडा :

यहाँ भी जितेन्द्रिय और विषयविरक्तता ये विशेषण शील ही को प्रधानता से दिखाते हैं ॥३५॥