
जं वंतं गिहवासे विसयसुहं इंदियत्थपरिभोए ।
तं खु ण कदाइभूदो भुंजंति पुणो वि सप्पुरिसा ॥853॥
पुव्वरदिकेलिदाइं जो इड्ढी भोगभोयणविहिं च ।
'ण वि ते कहंति कस्स वि ण वि ते मणसा विचिंतंति ॥854॥
अन्वयार्थ : गृहवास में जो इन्द्रियों द्वारा पदार्थों के अनुभव से विषय-सुख थे, उनको छोड़ दिया है वे यदि कदाचित् प्राप्त भी हुए तो भी साधु उनका सेवन नहीं करते हैं । पूर्व के स्नेह पूर्वक भोगे गये जो वैभव भोग और भोजन आदि हैं उनको वे मुनि न किसी के समक्ष कहते हैं और न वे मन से उनका चिन्तवन ही करते हैं ।