+ लोक का विस्तार -
सत्तेक -पंच-इक्का मूले मज्झे तहेव बंभंते
लोयंते रज्जूओ पुव्वावरदो य वित्थारो ॥118॥
अन्वयार्थ : पूरब-पश्चिम दिशा में लोक का विस्‍तार मूल में अर्थात् अधोलोक के नीचे सात राजू है । अधोलोक से ऊपर क्रमश: घटकर मध्‍यलोक में एक राजू का विस्‍तार है । पुन: क्रमश: बढ़कर ब्रह्म-लोक स्‍वर्ग के अन्‍त में पाँच राजू का विस्‍तार है । पुन: क्रमश: घटकर लोक के अन्‍त में एक राजू का विस्‍तार है ।

  छाबडा