सव्व-जहण्णं आऊ लद्धि-अपुण्णाण सव्व-जीवाणं
मज्झिम-हीण-महुत्तं पज्जत्ति-जुदाण णिकिट्ठं ॥164॥
अन्वयार्थ : [लद्धिअपुष्णाण सव्वजीवाणं] लब्ध्यपर्याप्तक सब जीवों की [सव्वजहण्णं आऊ] जघन्य आयु [मज्झिमहीणमुहुत्तं] मध्यमहीन मुहूर्त है (यह क्षुद्रभवमात्र जानना चाहिये एक उच्छ्वास के अठारहवें भाग मात्र है) [पजत्तिजदाण णिक्किटुं] लब्ध्य पर्याप्तक (कर्मभूभि के तिर्यंच मनुष्य सब ही पर्याप्त) जीवों की जघन्य आयु भी मध्यमहीन मुहूर्त है (यह पहिले से बड़ा मध्य अन्तर्मुहूर्त है)

  छाबडा