(शार्दूलविक्रीडितम्)
एता द्वादशभावना: खलु सखे सख्योऽपवर्गश्रिय-
स्तस्या: सङ्गमलालसैर्घटयितुं मैत्रीं प्रयुक्ता बुधै: ।
एतासु प्रगुणीकृतासु नियतं मुक्त्यङ्गना जायते
सानन्दा प्रणयप्रसन्नहृदया योगीश्वराणां मुदे ॥3॥
अन्वयार्थ : मित्र! ये बारह भावनायें निश्चय से मुक्तिरूपी लक्ष्मी की सखी हैं । इन्हें मुक्तिरूपी लक्ष्मी के संगम की लालसा करने वाले पंडितगणों ने मित्रता करने के अर्थ प्रयोगरूप कही हैं । इन भावनाओं के अभ्यास करने से मुक्तिरूपी स्त्री आनन्द सहित स्नेहरूप प्रसन्न हृदय होकर योगीश्वरों को आनन्ददायिनी होती है।
(दोहा)
ऐसे भावे भावना, शुभ वैराग्य जु पाय ।
ध्यान करे निज रूप को, ते शिव पहुँचे धाय ॥२॥

  वर्णीजी