
सुहुमम्मि कायजोगे वट्टंतो केवली तदियसुक्कम् ।
झायदि णिरुंभिदुंजे सुहुमत्तणकायजोगं पि॥1894॥
सूक्षम काय योग में वर्तन करते जो केवलि भगवान ।
काय योग रोकने हेतु ध्याते हैं वे यह तीजा ध्यान॥1894॥
अन्वयार्थ : जिसमें श्रुतज्ञान का अवलंबन नहीं; अर्थ, व्यंजन, योगों का पलटना नहीं, सूक्ष्म काययोग में समस्त पदार्थ को एक समय में ही जानते हैं, उसे सूक्ष्मक्रिया नाम का ध्यान कहते हैं । सूक्ष्मकाययोग में रहने वाले सूक्ष्मकाययोग को रोककर केवली भगवान निश्चल रहते हैं, वह तीसरा सूक्ष्मक्रिया अप्रतिपाती नाम का ध्यान है ।
सदासुखदासजी