+ चँवर प्रतिहार्य का वर्णन -
लीलोद्वेलित-बाहु-कंकण-रणत्कार-प्रहृष्टै: सुरै:;
चञ्चच्चन्द्र-मरीचि-संचय-समाकारैश्चलच्चामरै: ।
नित्यं य: परिवीज्यते त्रिजगतां, नाथस्तथाप्यस्पृह:;
सोऽस्मान् पातु निरंजनो जिनपति:, श्रीशान्तिनाथ: सदा ॥8॥
लीला से कंपित भुज-कंकण, के शब्दों से हर्षित देव ।
उज्ज्वल चन्द्र-किरण सम चञ्चल, चँवर ढोरते अमर सदैव॥
तीन लोक के नाथ प्रभु हैं, किन्तु नहीं किञ्चित् इच्छा ।
पापरहित श्री शान्तिनाथ! हम सबकी रक्षा करें सदा॥
अन्वयार्थ : श्री शान्तिनाथ भगवान के ऊपर, विविध लीलाओं से कम्पित भुजाओं में पहिने हुए कंकण के रणत्कार ध्वनि से हर्षित देव, दैदीप्यमान चन्द्रमा की किरणों के समान रूप को धारण करनेवाले चञ्चल चँवरों को ढोरते हैं तथापि तीन लोक के नाथ अत्यन्त निरीह (समस्त पदार्थों की इच्छा एवं समस्त पापों से रहित) हैं - ऐसे श्री शान्तिनाथ भगवान, सदैव हमारी रक्षा करें; ऐसे श्री शान्तिनाथ भगवान को हमारा नमस्कार है ।