+ दिव्यध्वनि प्रातिहार्य का वर्णन -
विस्तीर्णाऽखिल-वस्तु-तत्त्व-कथना,-पार-प्रवाहोज्ज्वला;
नि:शेषाऽर्थि-निषेविताऽतिशिशिरा, शैलादिवोत्तुङ्गत: ।
प्रोद्भूता हि सरस्वती सुरनुता, विश्वं पुनाना यत:;
सोऽस्मान् पातु निरंजनो जिनपति:, श्रीशान्तिनाथ: सदा ॥7॥
अति विस्तीर्ण तत्त्व-प्रतिपादन, से उज्ज्वल शीतल गंगा ।
देवों द्वारा वन्दित एवं, मोक्षार्थी करते सेवा॥
ऊँचे गिरि सम प्रभु से प्रगटी, करें जगत् उद्धार सदा ।
पापरहित श्री शान्तिनाथ! हम सबकी रक्षा करें सदा॥
अन्वयार्थ : अत्यन्त विस्तीर्ण, समस्त तत्त्वों के कथनरूपी प्रवाह से उज्ज्वल, जिसकी समस्त अर्थिजन (याचक) सेवा करते हैं, जो अत्यन्त शीतल है, जिसकी समस्त देव स्तुति करते हैं और जो समस्त जगत् को पवित्र करनेवाली है - ऐसी सरस्वती (गङ्गा) अत्यन्त ऊँचे पर्वत के समान श्री शान्तिनाथ भगवान से प्रकट हुई है; ऐसे समस्त पापों से रहित श्री शान्तिनाथ भगवान सदैव हमारी रक्षा करें ।