
भावार्थ :
विशेषार्थ- जिसे गुण और दोष के विषय में विवेक उत्पन्न हो चुका है उसे यह निश्चय हो जाता है कि सम्यग्दर्शनादि गुण हैं, क्योंकि वे आत्मा का कल्याण करने वाले हैं; तथा इनके विपरीत मिथ्यादर्शन आदि दोष हैं, क्योंकि वे आत्मा का अहित करनेवाले हैं। कहा भी है- न सम्यक्त्वसमं किंचित् त्रैकाल्ये त्रिजगत्यपि। श्रेयोऽश्रेयश्च मिथ्यात्वसमं नान्यत्तनूभृताम् ॥ अर्थात् तीनों काल और तीनों लोकों में सम्यक्त्व के समान दूसरा कोई प्राणियों का हितकारक नहीं है और मिथ्यात्व के समान अन्य कोई अहितकारक नहीं है ॥र. श्रा. 34॥ इस प्रकार गुण-दोषों का निश्चय हो जाने पर जो दोषों के कारणों को- मिथ्या उपदेश एवं विषयकांक्षा आदि को- खोजकर उन्हें छोड देता है और गुणों के कारणों को- सदुपदेश एवं विषयतृष्णानिवृत्ति आदि को- खोजकर उन्हें ग्रहण कर लेता है वह मोक्षमार्ग का पथिक हो जाता है। कारण यह कि उसे जो विवेकपूर्वक गुण-दोष का परिज्ञान हुआ है वह तो हुआ सम्यग्दर्शनपूर्वक सम्यग्ज्ञान; तथा गुण के कारणों का ग्रहण और दोष के कारणों का परित्याग यह हुआ सम्यक्चारित्र; इस प्रकार से वह रत्नत्रयस्वरूप मोक्षमार्ग में प्रवृत्त होकर शीघ्र ही अविनश्वर सुख को प्राप्त कर लेता है ॥१४७॥ |