पद्मप्रभमलधारिदेव
001 - मंगलाचरण
002 - मार्ग और मार्ग-फल
003 - स्वभाव रत्नत्रय
004 - रत्नत्रय के भेद और लक्षण
005 - व्यवहार सम्यक्त्व
006 - १८ दोषों का स्वरूप
007 - तीर्थंकर का स्वरूप
008 - आगम का स्वरूप
009 - द्रव्यों के नाम
010 - उपयोग लक्षण
011-012 - ज्ञान के भेद
013 - दर्शनोपयोग
014 - दर्शनोपयोग के भेद
015 - स्वभाव-विभाव पर्याय
016-017 - चार-गति का स्वरूप
018 - आत्मा का कर्तत्व-भोक्तृत्व
019 - दोनों नयों की उपयोगिता
020 - पुद्गल-द्रव्य के भेद
021-024 - पुद्गल के भेद
025 - कारण और कार्य-परमाणु द्रव्य
026 - परमाणु का विशेष कथन
027 - स्वभाव-पुद्गल
028 - पुद्गल-पर्याय
029 - पुद्गल-द्रव्य - उपसंहार
030 - धर्म-अधर्म-आकाश
031 - व्यवहारकाल और उसके भेद
032 - मुख्य काल का स्वरूप
033 - अमूर्त अचेतन द्रव्यों की पर्याय
034 - पंचास्तिकाय
035-036 - द्रव्यों के प्रदेश
037 - उपसंहार
038 - हेय और उपादेय तत्त्व
039 - निर्विकल्प तत्त्व
040 - बन्ध-उदय स्थान जीव नहीं
041 - चार विभाव-स्वभावों और पंचम-भाव
042 - शुद्ध-जीव को विकार नहीं
043 - शुद्ध-आत्मा को विभाव का अभाव
044 - शुद्ध जीव का स्वरूप
045-046 - कारण-परमात्मा का स्वरूप
047 - संसारी और मुक्त जीवों में अन्तर नहीं
048 - कार्य तथा कारण-समयसार में अन्तर नहीं
049 - निश्चय और व्यवहारनय की उपादेयता
050 - हेय-उपादेय का स्वरूप
051-055 - रत्नत्रय का स्वरूप
056 - अहिंसाव्रत
057 - सत्यव्रत
058 - अचौर्य-व्रत
059 - ब्रह्मचर्य-व्रत
060 - परिग्रह-त्याग व्रत
061 - ईर्या-समिति
062 - भाषा-समिति
063 - एषणा-समिति
064 - आदाननिक्षेपण समिति
065 - प्रतिष्ठापन समिति
066 - व्यवहार मनोगुप्ति
067 - वचन-गुप्ति
068 - काय-गुप्ति
069 - निश्चय मनोगुप्ति और वचनगुप्ति
070 - निश्चय काय-गुप्ति
071 - अर्हत् परमेश्वर
072 - सिद्ध-परमेष्ठि
073 - आचार्य
074 - उपाध्याय
075 - साधुओं का स्वरूप
076 - व्यवहार-चारित्र-अधिकार का उपसंहार
077-081 - पंचरत्न का स्वरूप
082 - भेदविज्ञान द्वारा निश्चय-चारित्र
083 - वचनगुप्त रागादि-रहित ही प्रतिक्रमण
084 - विराधना-रहित आत्माराधक ही प्रतिक्रमण
085 - अनाचरण-रहित आचारी ही प्रतिक्रमण
086 - उन्मार्ग-त्यागी जिनमार्गी ही प्रतिक्रमण
087 - निःशल्यभाव ही प्रतिक्रमण
088 - त्रिगुप्तिगुप्त ही प्रतिक्रमण
089 - धर्म-शुक्ल ध्यानी ही प्रतिक्रमण
090 - अनासन्न-भव्य जीव के पूर्वापर परिणाम
091 - निश्चय-रत्नत्रय धारक ही प्रतिक्रमण
092 - निश्चय-उत्तमार्थ प्रतिक्रमण
093 - ध्यान एक उपादेय
094 - व्यवहार प्रतिक्रमण की सफलता
095 - निश्चय प्रत्याख्यान का स्वरूप
096 - अनंतचतुष्टयात्मक निज-आत्मा के ध्यान का उपदेश
097 - ज्ञानी को शिक्षा
098 - बन्ध-रहित आत्मा को भाना चाहिये
099 - सकल विभाव के त्याग की विधि
100 - सर्वत्र आत्मा उपादेय है
101 - संसारावस्था में और मुक्ति में जीव निःसहाय है
102 - एकत्व भावनारूप से परिणमित सम्यग्ज्ञानी के लक्षण
103 - आत्मगत दोषों से मुक्त होने के उपाय
104 - अंतर्मुख परम-तपोधन की भाव-शुद्धि
105 - निश्चय-प्रत्याख्यान के योग्य जीव का स्वरूप
106 - निश्चय-प्रत्याख्यान अधिकार का उपसंहार
107 - निश्चय-आलोचना का स्वरूप
108 - आलोचना के स्वरूप के भेद
109 - आलोचन
110 - आलुंछन
111 - अविकृतिकरण
112 - भावशुद्धि
113-114 - निश्चय-प्रायश्चित्त का स्वरूप
115 - चार कषायों पर विजय प्राप्त करने का उपाय
116 - शुद्ध ज्ञान के स्वीकारवाले को प्रायश्चित्त है
117 - परम तपश्चरण में लीन परम जिनयोगीश्वरों को निश्चय-प्रायश्चित्त
118 - कारण परमात्म तत्त्व में सदा अन्तर्मुख रहकर जो प्रतपन वह तप प्रायश्चित्त
119 - निश्चय धर्मध्यान ही सर्व भावों का अभाव करने में समर्थ
120 - शुद्धनिश्चय-नियम का स्वरूप
121 - निश्चय-कायोत्सर्ग का स्वरूप
122 - परम समाधि का स्वरूप
123 - समाधि का लक्षण
124 - समता-रहित श्रमण को कुछ भी कार्यकारी नहीं
125 - किस मुनि को सामायिक व्रत स्थायी है?
126 - परम मुमुक्षु का स्वरूप
127 - आत्मा ही उपादेय है
128 - रागद्वेष के अभाव से अपरिस्पंदरूपता
129 - आर्त और रौद्र ध्यान के परित्याग द्वारा सामायिक-व्रत
130 - सुकृत-दुष्कृतरूप कर्म के संन्यास की विधि
131-132 - नौ नोकषाय की विजय
133 - परम-समाधि अधिकार का उपसंहार
134 - रत्नत्रय का स्वरूप
135 - सिद्ध-भक्ति का स्वरूप
136 - निज-परमात्मा की भक्ति
137 - निश्चय-योग-भक्ति
138 - निश्चय - योग भक्ति का स्वरूप
139 - विपरीत अभिनिवेश रहित आत्मभाव ही निश्चय - परमयोग
140 - भक्ति अधिकार का उपसंहार
141 - निरन्तर स्ववश को निश्चय - आवश्यक - कर्म
142 - अवश परम जिनयोगीश्वर को परम आवश्यक कर्म अवश्य
143 - भेदोपचार - रत्नत्रय परिणतिवाले जीव को अवशपना नहीं
144 - अन्यवश ऐसे अशुद्ध अन्तरात्म जीव का लक्षण
145 - अन्यवश का स्वरूप
146 - साक्षात् स्ववश परमजिनयोगीश्वर का स्वरूप
147 - शुद्धनिश्चय - आवश्यक की प्राप्ति का जो उपाय
148 - शुद्धोपयोग सम्मुख जीव को शिक्षा
149 - आवश्यक कर्म के अभाव में तपोधन बहिरात्मा
150 - बाह्य तथा अन्तर जल्प का खण्डन
151 - स्वात्माश्रित धर्मध्यान और शुक्लध्यान ही उपादेय
152 - परम वीतराग चारित्र में स्थित परम तपोधन
153 - समस्त वचन सम्बन्धी व्यापार का खण्डन
154 - शुद्ध निश्चय धर्मध्यानस्वरूप प्रतिक्रमणादि ही करने योग्य
155 - साक्षात् अन्तर्मुख परम जिनयोगी को शिक्षा
156 - वचन-सम्बन्धी व्यापार की निवृत्ति के हेतु का कथन
157 - दृष्टान्त द्वारा सहजतत्त्व की आराधना की विधि
158 - परमावश्यक अधिकार का उपसंहार
159 - समस्त कर्म के प्रलय के हेतुभूत शुद्धोपयोग का अधिकार
160 - दृष्टान्त द्वारा केवलज्ञान और केवलदर्शन का युगपद् वर्तना
161 - आत्मा के स्व-पर प्रकाशकपने सम्बन्धी विरोध-कथन
162 - पूर्वपक्ष के सिद्धान्त सम्बन्धी कथन
163 - एकान्त से आत्मा को पर-प्रकाशकपना का खण्डन
164 - व्यवहारनय की सफलता
165 - निश्चयनय से स्वरूप का कथन
166 - शुद्धनिश्चयनय से पर-दर्शन का खण्डन
167 - केवलज्ञान का स्वरूप
168 - केवलदर्शन के अभाव में सर्वज्ञपना नहीं
169 - व्यवहारनय की प्रगटता
170 - 'जीव ज्ञान-स्वरूप है' ऐसा वितर्क से कथन
171 - गुण-गुणी में भेद का अभाव होनेरूप स्वरूप का कथन
172 - सर्वज्ञ वीतराग को वांछा का अभाव
173-174 - वास्तव में ज्ञानी को बन्ध के अभाव
175 - केवली को मन-रहितपना
176 - शुद्ध जीव को स्वभावगति की प्राप्ति होने का उपाय
177 - कारण-परमतत्त्व का स्वरूप
178 - परमात्म तत्त्व निरुपाधि स्वरूप
179 - परमतत्त्व में सांसारिक विकारसमूह का अभाव
180 - परमतत्त्व का स्वरूप
181 - कर्म-रहित तथा विकल्प रहित परमतत्त्व
182 - सिद्ध के स्वभावगुण
183 - सिद्धि और सिद्ध के एकत्व का प्रतिपादन
184 - सिद्धक्षेत्र से ऊपर जीव-पुद्गलों के गमन का निषेध
185 - नियम शब्द का तथा उसके फल का उपसंहार
186 - भव्य को शिक्षा
187 - उपसंहार
पद्मप्रभमलधारिदेव
!!
श्रीसर्वज्ञवीतरागाय नम:
!!
श्रीमद्-भगवत्कुन्दकुन्दाचार्य-देव-प्रणीत
श्री
नियमसार
मूल प्राकृत गाथा, पद्मप्रभमलधारिदेव कृत संस्कृत टीका के हिंदी अनुवाद सहित
आभार :
पद्मप्रभमलधारिदेव
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