जचंदछाबडा
1-01 - मंगलाचरण
1-02 - दर्शन-रहित अवन्दनीय
1-03 - दर्शन रहित चारित्र से निर्वाण नहीं
1-04 - ज्ञान से भी दर्शन को अधिकता
1-05 - सम्यक्त्वरहित तप से भी स्वरूप-लाभ नहीं
1-06 - सम्यक्त्व सहित सभी प्रवृत्ति सफल है
1-07 - सम्यक्त्व आत्मा को कर्मरज नहीं लगने देता
1-08 - दर्शनभ्रष्ट भ्रष्ट हैं
1-09 - दर्शन-भ्रष्ट द्वारा धर्मात्मा पुरुषों को दोष लगाना
1-10 - दर्शन-भ्रष्ट को फल-प्राप्ति नहीं
1-11 - जिनदर्शन ही मूल मोक्षमार्ग है
1-12 - दर्शन-भ्रष्ट दर्शन-धारकों की विनय करें
1-13 - दर्शन-भ्रष्ट की विनय नहीं
1-14 - सम्यक्त्व के पात्र
1-15 - सम्यग्दर्शन से ही कल्याण-अकल्याण का निश्चय
1-16 - कल्याण-अकल्याण को जानने का प्रयोजन
1-17 - सम्यक्त्व जिनवचन से प्राप्त होता है
1-18 - जिनवचन में दर्शन का लिंग
1-19 - बाह्यलिंग सहित अन्तरंग श्रद्धान ही सम्यग्दृष्टि
1-20 - सम्यक्त्व के दो प्रकार
1-22 - श्रद्धानी के ही सम्यक्त्व
1-24 - यथाजातरूप को मत्सरभाव से वन्दना नहीं करते, वे मिथ्यादृष्टि
1-25 - इसी को दृढ़ करते हैं
1-26 - असंयमी वंदने योग्य नहीं
1-27 - इस ही अर्थ को दृढ़ करते हैं
1-28 - तप आदि से संयुक्त को नमस्कार
1-29 - समवसरण सहित तीर्थंकर वंदने योग्य हैं या नहीं
1-31 - ज्ञान आदि के उत्तरोत्तर सारपना
1-32 - इसी अर्थ को दृढ़ करते हैं
1-33 - सम्यग्दर्शनरूप रत्न देवों द्वारा पूज्य
1-34 - सम्यक्त्व का माहात्म्य
1-35 - स्थावर प्रतिमा
1-36 - जंगम प्रतिमा
2-01 - सूत्र का स्वरूप
2-02 - सूत्रानुसार प्रवर्तनेवाला भव्य
2-03 - सूत्र-प्रवीण के संसार नाश
2-04 - सूई का दृष्टान्त
2-05 - सूत्र का जानकार सम्यक्त्वी
2-06 - दो प्रकार से सूत्र-निरूपण
2-07 - सूत्र और पद से भ्रष्ट मिथ्यादृष्टि
2-08 - जिनूसत्र से भ्रष्ट हरि-हरादिक भी हो तो भी मोक्ष नहीं
2-09 - जिनसूत्र से च्युत, स्वच्छंद प्रवर्तते हैं, वे मिथ्यादृष्टि
2-10 - जिनसूत्र में मोक्षमार्ग ऐसा
2-11 - मोक्षमार्ग में प्रवृत्ति
2-12 - उनकी प्रवृत्ति का विशेष
2-13 - शेष सम्यग्दर्शन ज्ञान से युक्त वस्त्रधारी इच्छाकार योग्य
2-14 - इच्छाकार योग्य श्रावक का स्वरूप
2-15 - इच्छाकार के अर्थ को नहीं जान, अन्य धर्म का आचरण से सिद्धि नहीं
2-16 - इस ही अर्थ को दृढ़ करके उपदेश
2-17 - जिनसूत्र के जानकार मुनि का स्वरूप
2-18 - अल्प परिग्रह ग्रहण में दोष
2-19 - इस ही का समर्थन करते हैं
2-20 - जिनवचन में ऐसा मुनि वन्दने योग्य
2-21 - दूसरा भेष उत्कृष्ट श्रावक का
2-22 - तीसरा लिंग स्त्री का
2-23 - वस्त्र धारक के मोक्ष नहीं
2-24 - स्त्रियों को दीक्षा नहीं है इसका कारण
2-25 - दर्शन से शुद्ध स्त्री पापरहित
2-26 - स्त्रियों के निशंक ध्यान नहीं
2-27 - सूत्रपाहुड का उपसंहार
3-01-02 - नमस्कृति तथा चारित्र-पाहुड लिखने की प्रतिज्ञा
3-03 - सम्यग्दर्शनादि तीन भावों का स्वरूप
3-04 - जो तीन भाव जीव के हैं उनकी शुद्धता के लिए चारित्र दो प्रकार का कहा है
3-05 - दो प्रकार का चारित्र
3-06 - सम्यक्त्वचरण चारित्र के मल दोषों का परिहार
3-07 - सम्यक्त्व के आठ अंग
3-08 - इसप्रकार पहिला सम्यक्त्वाचरण चारित्र कहा
3-09 - सम्यक्त्वाचरण चारित्र को अंगीकार करके संयमचरण चारित्र को अंगीकार करने की प्रेरणा
3-10 - सम्यक्त्वाचरण से भ्रष्ट और वे संयमाचरण सहित को मोक्ष नहीं
3-11-12 - सम्यक्त्वाचरण चारित्र के चिह्न
3-13 - सम्यक्त्व कैसे छूटता है?
3-14 - सम्यक्त्व से च्युत कब नहीं होता है?
3-15 - अज्ञान मिथ्यात्व कुचारित्र के त्याग का उपदेश
3-16 - फिर उपदेश करते हैं
3-17 - यह जीव अज्ञान और मिथ्यात्व के दोष से मिथ्यामार्ग में प्रवर्तन करता है
3-18 - सम्यग्दर्शन-ज्ञान-श्रद्धान से चारित्र के दोष दूर होते हैं
3-19 - सम्यग्दर्शन-ज्ञान-चारित्र से शीघ्र मोक्ष
3-20 - सम्यक्त्वाचरण चारित्र के कथन का संकोच करते हैं
3-21 - संयमाचरण चारित्र
3-22 - सागार संयमाचरण
3-23 - इन स्थानों में संयम का आचरण किसप्रकार से है?
3-24 - पाँच अणुव्रतों का स्वरूप
3-25 - तीन गुणव्रत
3-26 - चार शिक्षाव्रत
3-27 - यतिधर्म
3-28 - यतिधर्म की सामग्री
3-29 - पाँच इन्द्रियों के संवरण का स्वरूप
3-31 - इनको महाव्रत क्यों कहते हैं?
3-32 - अहिंसाव्रत की पाँच भावना
3-33 - सत्य महाव्रत की भावना
3-34 - अचौर्य महाव्रत की भावना
3-35 - ब्रह्मचर्य महाव्रत की भावना
3-36 - पाँच अपरिग्रह महाव्रत की भावना
3-37 - पाँच समिति
3-38 - ज्ञान का स्वरूप
3-39 - जो इसप्रकार ज्ञान से ऐसे जानता है, वह सम्यग्ज्ञानी
3-40 - मोक्षमार्ग को जानकर श्रद्धा सहित इसमें प्रवृत्ति करता है, वह शीघ्र ही मोक्ष को प्राप्त करता है
3-41 - निश्चयचारित्ररूप ज्ञान का स्वरूप कि महिमा
3-42 - गुण दोष को जानने के लिए ज्ञान को भले प्रकार से जानना
3-43 - जो सम्यग्ज्ञान सहित चारित्र धारण करता है, वह थोड़े ही काल में अनुपम सुख को पाता है
3-44 - चारित्र के कथन का संकोच
3-45 - चारित्रपाहुड़ को भाने का उपदेश और इसका फल
4-01-02 - ग्रन्थ करने की मंगलपूर्वक प्रतिज्ञा
4-03-04 - 'बोधपाहुड' में ग्यारह स्थलों के नाम
4-08 - चैत्यगृह का निरूपण
4-14 - दर्शन का स्वरूप
4-16 - जिनबिंब का निरूपण
4-19 - जिनमुद्रा का स्वरूप
4-20 - ज्ञान का निरूपण
4-21 - इसी को दृष्टान्त द्वारा दृढ़ करते हैं
4-22 - इसप्रकार ज्ञान-विनय-संयुक्त पुरुष होवे वही मोक्ष को प्राप्त करता है
4-25 - धर्मादिक का स्वरूप
4-26 - तीर्थ का स्वरूप
4-28 - अरहंत का स्वरूप
4-29 - नाम को प्रधान करके कहते हैं
4-31 - स्थापना द्वारा अरहंत का वर्णन
4-32 - गुणस्थान में अरिहंत की स्थापना
4-34 - पर्याप्ति में अरिहंत की स्थापना
4-35 - प्राण में अरिहंत की स्थापना
4-36 - जीवस्थान में अरिहंत की स्थापना
4-37-39 - द्रव्य की प्रधानता से अरहंत का निरूपण
4-42-44 - प्रव्रज्या (दीक्षा) का निरूपण
4-45 - प्रव्रज्या का स्वरूप
4-51 - दीक्षा का बाह्यस्वरूप
4-57 - अन्य विशेष
4-60 - बोधपाहुड का संकोच
4-61 - बोधपाहुड पूर्वाचार्यों के अनुसार कहा है
4-62 - भद्रबाहु स्वामी की स्तुतिरूप वचन
5-001 - मंगलाचरण कर ग्रन्थ करने की प्रतिज्ञा
5-002 - दो प्रकार के लिंग में भावलिंग परमार्थ
5-003 - बाह्यद्रव्य के त्याग की प्रेरणा
5-004 - करोडों भवों के भाव रहित तप द्वारा भी सिद्धि नहीं
5-005 - इस ही अर्थ को दृढ़ करते हैं
5-006 - भाव को परमार्थ जानकर इसी को अंगीकार करो
5-007 - भाव-रहित द्रव्य-लिंग बहुत बार धारण किये, परन्तु सिद्धि नहीं हुई
5-008 - भाव-रहितपने के कारण चारों गतियों में दुःख प्राप्ति
5-009 - नरकगति के दुःख
5-010 - मनुष्यगति के दुःख
5-012 - देवगति के दुःख
5-013 - अशुभ भावना द्वारा देवों में भी दुःख
5-014 - पार्श्वस्थ भावना से दुःख
5-016 - अशुभ भावना से नीच देव होकर दुःख पाते हैं
5-017 - मनुष्य-तिर्यंच होवे, वहाँ गर्भ के दुःख
5-018 - अनंतों बार गर्भवास के दुःख प्राप्त किये
5-021 - जल-थल आदि स्थानों में सब जगह रहा
5-023 - समस्त जल पीया फिर भी प्यासा रहा
5-024 - अनेक बार शरीर ग्रहण किया
5-025-27 - आयुकर्म अनेक प्रकार से क्षीण हो जाता है
5-028 - निगोद के दुःख
5-029 - क्षुद्रभव -- अंतर्मुहूर्त्त के जन्म-मरण
5-030 - इसलिए अब रत्नत्रय धारण कर
5-031 - रत्नत्रय इसप्रकार है
5-032 - सुमरण का उपदेश
5-033 - क्षेत्र-परावर्तन
5-034 - काल-परावर्तन
5-035 - द्रव्य-परावर्तन
5-036 - क्षेत्र परावर्तन
5-038 - उन रोगों का दुःख तूने बहुत सहा
5-041 - बालकपन में भी अज्ञान-जनित दुःख
5-042 - देह के स्वरूप का विचार करो
5-043 - अन्तरंग से छोड़ने का उपदेश
5-044 - भावशुद्धि बिना सिद्धि नहीं -- उदाहरण बाहुबली
5-045 - मधुपिंगल मुनि का उदाहरण करते हैं
5-046 - भावशुद्धि बिना सिद्धि नहीं -- वशिष्ठ मुनि
5-047 - भावरहित चौरासी लाख योनियों में भ्रमण
5-048 - द्रव्य-मात्र से लिंगी नहीं, भाव से होता है
5-049 - द्रव्यलिंगधारक को उलटा उपद्रव हुआ -- उदाहरण
5-050 - दीपायन मुनि का उदाहरण
5-051 - भाव-शुद्धि सहित मुनि हुए उन्होंने सिद्धि पाई, उसका उदाहरण
5-052 - भाव-शुद्धि बिना शास्त्र भी पढ़े तो सिद्धि नहीं -- उदाहरण अभव्यसेन
5-053 - शास्त्र पढ़े बिना भी भाव-विशुद्धि द्वारा सिद्धी -- उदाहरण शिवभूति मुनि
5-054 - इसी अर्थ को सामान्यरूप से कहते हैं
5-055 - इसी अर्थ को दृढ़ करते हैं
5-056 - भावलिंग का निरूपण करते हैं
5-057 - इसी अर्थ को स्पष्ट कर कहते हैं
5-058 - ज्ञान, दर्शन, संयम, त्याग संवर और योग इनमें अभेद के अनुभव की प्रेरणा
5-059 - इसी अर्थ को दृढ़ करते हैं
5-060 - जो मोक्ष चाहे वह इसप्रकार आत्मा की भावना करे
5-061 - जो आत्मा को भावे वह इसके स्वभाव को जानकर भावे, वही मोक्ष पाता है
5-062 - जीव का स्वरूप
5-063 - जो पुरुष जीव का अस्तित्व मानते हैं वे सिद्ध होते हैं :
5-064 - वचन के अगोचर है और अनुभवगम्य जीव का स्वरूप इसप्रकार है
5-065 - जीव का स्वभाव -- ज्ञानस्वरूप
5-066 - पढ़ना, सुनना भी भाव बिना कुछ नहीं है
5-067 - यदि बाह्य नग्नपने से ही सिद्धि हो तो नग्न तो सब ही होते हैं
5-068 - केवल नग्नपने की निष्फलता दिखाते हैं
5-069 - भाव-रहित द्रव्य-नग्न होकर मुनि कहलावे उसका अपयश होता है
5-070 - भावलिंगी होने का उपदेश करते हैं
5-071 - भावरहित नग्न मुनि है वह हास्य का स्थान है
5-072 - द्रव्यलिंगी बोधि-समाधि जैसी जिनमार्ग में कही है वैसी नहीं पाता है
5-073 - पहिले भाव से नग्न हो, पीछे द्रव्यमुनि बने यह मार्ग है
5-074 - शुद्ध भाव ही स्वर्ग-मोक्ष का कारण है, मलिनभाव संसार का कारण है
5-075 - भाव के फल का माहात्म्य
5-077 - भाव -- शुभ, अशुभ और शुद्ध । आर्त्त और रौद्र ये अशुभ ध्यान हैं तथा धर्मध्यान शुभ है
5-078 - जिनशासन का इसप्रकार माहात्म्य है
5-079 - ऐसा मुनि ही तीर्थंकर-प्रकृति बाँधता है
5-080 - भाव की विशुद्धता के लिए निमित्त आचरण कहते हैं
5-081 - द्रव्य-भावरूप सामान्यरूप से जिनलिंग का स्वरूप
5-082 - जिनधर्म की महिमा
5-083 - धर्म का स्वरूप
5-084 - पुण्य ही को धर्म मानना केवल भोग का निमित्त, कर्मक्षय का नहीं
5-085 - आत्मा का स्वभावरूप धर्म ही मोक्ष का कारण
5-086 - आत्मा के लिए इष्ट बिना समस्त पुण्य के आचरण से सिद्धि नहीं
5-087 - आत्मा ही का श्रद्धान करो, प्रयत्न-पूर्वक जानो, मोक्ष प्राप्त करो
5-088 - बाह्य-हिंसादिक क्रिया के बिना, अशुद्ध-भाव से तंदुल मत्स्य नरक को गया
5-089 - भावरहित के बाह्य परिग्रह का त्यागादिक निष्प्रयोजन
5-090 - भावशुद्धि के लिये इन्द्रियादिक को वश करो, भावशुद्धि-रहित बाह्यभेष का आडम्बर मत करो
5-093 - ऐसा करने से क्या होता है ?
5-094 - भावशुद्धि के लिए फिर उपदेश
5-095 - परीषह जय की प्रेरणा
5-097 - भाव-शुद्ध रखने के लिए ज्ञान का अभ्यास
5-098 - भाव-शुद्धि के लिए अन्य उपाय
5-099 - भावसहित आराधना के चतुष्क को पाता है, भाव बिना संसार में भ्रमण
5-100 - आगे भाव ही के फल का विशेषरूप से कथन
5-101 - अशुद्ध-भाव से अशुद्ध ही आहार किया, इसलिये दुर्गति ही पाई
5-102 - सचित्त भोजन पान -- अशुद्ध-भाव
5-103 - कंद-मूल-पुष्प आदि सचित्त भोजन -- अशुद्ध-भाव
5-104 - विनय का वर्णन
5-106 - गर्हा का उपदेश
5-107 - क्षमा का उपदेश
5-108 - क्षमा का फल
5-109 - क्षमा करना और क्रोध छोड़ना
5-110 - दीक्षाकालादिक की भावना का उपदेश
5-111 - भावलिंग शुद्ध करके द्रव्यलिंग सेवन का उपदेश
5-112 - चार संज्ञा का फल संसार-भ्रमण
5-113 - बाह्य उत्तरगुण की प्रेरणा
5-114 - तत्त्व की भावना का उपदेश
5-115 - तत्त्व की भावना बिना मोक्ष नहीं
5-117 - पाप-बंध के परिणाम
5-118 - इससे उलटा जीव है वह पुण्य बाँधता है
5-119 - आठों कर्मों से मुक्त होने की भावना
5-120 - कर्मों का नाश के लिये उपदेश
5-121 - भेदों के विकल्प से रहित होकर ध्यान का उपदेश
5-122 - यह ध्यान भावलिंगी मुनियों का मोक्ष करता है
5-123 - दृष्टांत
5-124 - पंच परमेष्ठी का ध्यान करने का उपदेश
5-125 - ज्ञान के अनुभवन का उपदेश
5-126 - ध्यानरूप अग्नि से आठों कर्म नष्ट होते हैं
5-127 - उपसंहार - भाव श्रमण हो
5-128 - भाव-श्रमण का फल प्राप्त कर
5-129 - भावश्रमण धन्य है, उनको हमारा नमस्कार
5-130 - भावश्रमण देवादिक की ऋद्धि देखकर मोह को प्राप्त नहीं होते
5-131 - भाव-श्रमण को सांसारिक सुख की कामना नहीं
5-132 - बुढापा आए उससे पहले अपना हित कर लो
5-133 - अहिंसाधर्म के उपदेश का वर्णन
5-134 - अज्ञान-पूर्वक भूत-काल में त्रस-स्थावर जीवों का भक्षण
5-135 - प्राणि-हिंसा से संसार में भ्रमण कर दुःख पाया
5-136 - दया का उपदेश
5-137 - मिथ्यात्व से संसार में भ्रमण । मिथ्यात्व के भेद
5-138 - अभव्यजीव अपनी प्रकृति को नहीं छोड़ता, उसका मिथ्यात्व नहीं मिटता
5-139 - एकान्त मिथ्यात्व के त्याग की प्रेरणा
5-141 - अनायातन त्याग की प्रेरणा
5-142 - सर्व मिथ्या मत को छोड़ने की प्रेरणा
5-143 - सम्यग्दर्शन-रहित प्राणी चलता हुआ मृतक है
5-144 - सम्यक्त्व का महानपना
5-145 - सम्यक्त्व ही जीव को विशिष्ट बनाता है
5-146 - सम्यग्दर्शन-सहित लिंग की महिमा
5-147 - ऐसा जानकर दर्शनरत्न को धारण करो
5-148 - जीवपदार्थ का स्वरूप
5-149 - सम्यक्त्व सहित भावना से घातिया कर्मों का क्षय
5-150 - घातिया कर्मों के नाश से अनन्त-चतुष्टय
5-151 - अनन्तचतुष्टय धारी परमात्मा के अनेक नाम
5-152 - अरिहंत भगवान मुझे उत्तम बोधि देवे
5-153 - अरहंत जिनेश्वर को नमस्कार से संसार की जन्मरूप बेल का नाश
5-154 - जिनसम्यक्त्व को प्राप्त पुरुष आगामी कर्म से लिप्त नहीं होता
5-155 - भाव सहित सम्यग्दृष्टि हैं वे ही सकल शील संयमादि गुणों से संयुक्त हैं, अन्य नहीं
5-156 - सम्यग्दृष्टि होकर जिनने कषायरूप सुभट जीते वे ही धीरवीर
5-157 - आप दर्शन-ज्ञान-चारित्ररूप होकर अन्य को भी उन सहित करते हैं, उनको धन्य है
5-158 - ऐसे मुनियों की महिमा करते हैं
5-159 - उन मुनियों के सामर्थ्य कहते हैं
5-160 - इसप्रकार मूलगुण और उत्तरगुणों से मंडित मुनि हैं वे जिनमत में शोभा पाते हैं
5-161 - इसप्रकार विशुद्ध-भाव द्वारा तीर्थंकर आदि पद के सुखों पाते हैं
5-162 - मोक्ष का सुख भी ऐसे ही पाते हैं
5-163 - सिद्ध-सुख को प्राप्त सिद्ध-भगवान मुझे भावों की शुद्धता देवें
5-164 - भाव के कथन का संकोच
5-165 - भावपाहुड़ को पढ़ने-सुनने व भावना करने का उपदेश
6-001 - मंगलाचरण और ग्रन्थ लिखने की प्रतिज्ञा
6-002 - मंगलाचरण कर ग्रंथ करने की प्रतिज्ञा
6-003 - ध्यानी उस परमात्मा का ध्यान कर परम पद को प्राप्त करते हैं
6-004 - आत्मा के तीन प्रकार
6-005 - तीन प्रकार के आत्मा का स्वरूप
6-006 - परमात्मा का विशेषण द्वारा स्वरूप
6-007 - अंतरात्मपन द्वारा बहिरात्मपन को छोड़कर परमात्मा बनो
6-008 - बहिरात्मा की प्रवृत्ति
6-009 - मिथ्यादृष्टि का लक्षण
6-010 - मिथ्यादृष्टि पर में मोह करता है
6-011 - मिथ्याज्ञान और मिथ्याभाव से आगामी भव में भी यह मनुष्य देह को चाहता है
6-012 - देह में निर्मम निर्वाण को पाता है
6-013 - बंध और मोक्ष के कारण का संक्षेप
6-014 - स्वद्रव्य में रत सम्यग्दृष्टि कर्मों का नाश करता है
6-015 - परद्रव्य में रत मिथ्यादृष्टि कर्मों को बाँधता है
6-016 - पर-द्रव्य से दुर्गति और स्व-द्रव्य से ही सुगति होती है
6-017 - पर-द्रव्य का स्वरूप
6-018 - स्व-द्रव्य (आत्म-स्वभाव) ऐसा होता है
6-019 - ऐसे निज-द्रव्य के ध्यान से निर्वाण
6-020 - शुद्धात्मा के ध्यान से स्वर्ग की भी प्राप्ति
6-021 - दृष्टांत
6-022 - अन्य दृष्टान्त
6-023 - ध्यान के योग से स्वर्ग / मोक्ष की प्राप्ति
6-025 - अव्रतादिक श्रेष्ठ नहीं है
6-026 - संसार से निकलने के लिए आत्मा का ध्यान करे
6-027 - आत्मा का ध्यान करने की विधि
6-028 - इसी को विशेषरूप से कहते हैं
6-029 - क्या विचारकर ध्यान करनेवाला मौन धारण करता है ?
6-030 - ध्यान द्वारा संवर और निर्जरा
6-031-32 - जो व्यवहार में तत्पर है उसके यह ध्यान नहीं
6-033 - जिनदेवने द्वारा ध्यान अध्ययन में प्रवृत्ति की प्रेरणा
6-034 - जो रत्नत्रय की आराधना करता है वह जीव आराधक ही है
6-035 - शुद्धात्मा केवलज्ञान है और केवलज्ञान शुद्धात्मा है
6-037-38 - आत्मा में रत्नत्रय कैसे है ?
6-039-40 - सम्यग्दर्शन को प्रधान कर कहते हैं
6-041 - सम्यग्ज्ञान का स्वरूप
6-042 - सम्यक्चारित्र का स्वरूप
6-043 - रत्नत्रय-सहित तप-संयम-समिति का पालन द्वारा शुद्धात्मा का ध्यान से निर्वाण की प्राप्ति
6-044-45 - ध्यानी मुनि ऐसा बनकर परमात्मा का ध्यान करता है
6-046 - विषय-कषायों में आसक्त परमात्मा की भावना से रहित है, उसे मोक्ष नहीं
6-047 - जिनमुद्रा जिन जीवों को नहीं रुचती वे दीर्घ-संसारी
6-048 - परमात्मा के ध्यान से लोभ-रहित होकर निरास्रव
6-049 - ऐसा निर्लोभी दृढ़ रत्नत्रय सहित परमात्मा के ध्यान द्वारा परम-पद को पाता है
6-050 - चारित्र क्या है ?
6-051 - जीव के परिणाम की स्वच्छता को दृष्टांत पूर्वक दिखाते हैं
6-052 - वह बाह्य में कैसा होता है?
6-053 - तीन गुप्ति की महिमा
6-054 - परद्रव्य में राग-द्वेष करे वह अज्ञानी, ज्ञानी इससे उल्टा है
6-055 - ज्ञानी मोक्ष के निमित्त भी राग नहीं करता
6-056 - कर्ममात्र से ही सिद्धि मानना अज्ञान
6-057 - चारित्र रहित ज्ञान और सम्यक्त्व रहित तप अर्थ-क्रियाकारी नहीं
6-058 - सांख्यमती आदि के आशय का निषेध
6-059-60 - तप रहित ज्ञान और ज्ञान रहित तप अकार्य हैं, दोनों के संयुक्त होने पर ही निर्वाण है
6-061 - बाह्यलिंग-सहित और अभ्यंतरलिंग-रहित मोक्षमार्ग नहीं
6-062 - तपश्चरण सहित ज्ञान को भाना
6-063 - आहार, आसन, निद्रा को जीतकर आत्मा का ध्यान करना
6-064 - ध्येय का स्वरूप
6-065 - आत्मा का जानना, भाना और विषयों से विरक्त होना ये उत्तरोत्तर दुर्लभ
6-066 - जब तक विषयों में प्रवर्तता है तब तक आत्म-ज्ञान नहीं होता
6-067 - आत्मा को जानकर भी भावना बिना संसार में ही रहना है
6-068 - जो विषयों से विरक्त होकर आत्मा को जानकर भाते हैं वे संसार को छोड़ते हैं
6-069 - पर-द्रव्य में लेशमात्र भी राग हो तो वह अज्ञानी
6-070 - इस अर्थ को संक्षेप से कहते हैं
6-071 - राग संसार का कारण होने से योगीश्वर आत्मा में भावना करते हैं
6-072 - रागद्वेष से रहित ही चारित्र होता है
6-073-74 - पंचमकाल आत्मध्यान का काल नहीं है, उसका निषेध
6-076 - अभी इस पंचमकाल में धर्मध्यान होता है, यह नहीं मानता है वह अज्ञानी है
6-077 - इस काल में भी रत्नत्रय का धारक मुनि स्वर्ग प्राप्त करके वहाँ से चयकर मोक्ष जाता है
6-078 - ध्यान का अभाव मानकर मुनिलिंग ग्रहण कर पाप में प्रवृत्ति करने का निषेध
6-079 - मोक्षमार्ग से च्युत वे कैसे हैं
6-080 - मोक्षमार्गी कैसे होते हैं ?
6-081 - मोक्षमार्गी की प्रवृत्ति
6-082 - फिर कहते हैं
6-083 - निश्चयनय से ध्यान इस प्रकार करना
6-084 - इस ही अर्थ को दृढ़ करते हुए कहते हैं
6-085 - अब श्रावकों को प्रवर्तने के लिए कहते हैं
6-086 - श्रावकों को पहिले क्या करना, वह कहते हैं
6-087-88 - सम्यक्त्व के ध्यान की ही महिमा
6-089 - जो निरन्तर सम्यक्त्व का पालन करते हैं उनको धन्य है
6-090 - इस सम्यक्त्व के बाह्य चिह्न बताते हैं
6-091 - इसी अर्थ को दृढ़ करते हैं
6-092-94 - मिथ्यादृष्टि के चिह्न कहते हैं
6-095 - मिथ्यादृष्टि जीव संसार में दुःख-सहित भ्रमण करता है
6-096 - सम्यक्त्व-मिथ्यात्व भाव के कथन का संकोच
6-097 - यदि मिथ्यात्व-भाव नहीं छोड़ा तब बाह्य भेष से कुछ लाभ नहीं
6-098 - मूलगुण बिगाड़े उसके सम्यक्त्व नहीं रहता ?
6-099-100 - आत्म-स्वभाव से विपरीत को बाह्य क्रिया-कर्म निष्फल
6-101-102 - ऐसा साधु मोक्ष पाता है
6-103 - सब से उत्तम पदार्थ -- शुद्ध-आत्मा इस देह में ही रह रहा है, उसको जानो
6-104-105 - आत्मा ही मुझे शरण है
6-106 - मोक्षपाहुड़ पढ़ने, सुनने, भाने का फल कहते हैं
7-01 - इष्ट को नमस्कार कर ग्रन्थ करने की प्रतिज्ञा
7-02 - बाह्यभेष अंतरंग-धर्म सहित कार्यकारी है
7-03 - निर्ग्रंथ लिंग ग्रहणकर कुक्रिया करके हँसी करावे, वे पापबुद्धि
7-04 - लिंग धारण करके कुक्रिया करे उसको प्रगट कहते हैं
7-05 - फिर कहते हैं
7-06 - फिर कहते हैं
7-07 - फिर कहते हैं
7-08 - फिर कहते हैं
7-09 - यदि भावशुद्धि के बिना गृहस्थपद छोड़े तो यह प्रवृत्ति होती है
7-10 - फिर कहते हैं
7-11 - लिंग धारण करके दुःखी रहता है, आदर नहीं करता, वह भी नरक में जाता है
7-12 - जो भोजन में भी रसों का लोलुपी होता है वह भी लिंग को लजाता है
7-13 - इसी को विशेषरूप से कहते हैं
7-14 - फिर कहते हैं
7-16 - लिंग ग्रहणकर वनस्पति आदि स्थावर जीवों की हिंसा का निषेध
7-17 - लिंग धारण करके स्त्रियों से राग करने का निषेध
7-18 - फिर कहते हैं
7-19 - उपसंहार
7-20 - श्रमण को स्त्रियों के संसर्ग का निषेध
7-21 - फिर कहते हैं
7-22 - जो धर्म का यथार्थरूप से पालन करता है वह उत्तम सुख पाता है
8-01 - नमस्काररूप मंगल
8-02 - शील का रूप
8-03 - ज्ञान की भावना करना और विषयों से विरक्त होना दुर्लभ
8-04 - विषयों में प्रवर्तता है तबतक ज्ञान को नहीं जानता है
8-05 - ज्ञान का, लिंगग्रहण का तथा तप का अनुक्रम
8-06 - ऐसा करके थोड़ा भी करे तो बड़ा फल होता है
8-07 - विषयासक्त रहते हैं वे संसार ही में भ्रमण करते हैं
8-08 - ज्ञान प्राप्त करके इसप्रकार करे तब संसार कटे
8-09 - शीलसहित ज्ञान से जीव शुद्ध होता है उसका दृष्टान्त
8-10 - विषयासक्ति ज्ञान का दोष नहीं, कुपुरुष का दोष
8-11 - इसप्रकार निर्वाण होता है
8-12 - शील की मुख्यता द्वारा नियम से निर्वाण
8-13 - अविरति को भी 'मार्ग' विषयों से विरक्त ही कहना योग्य
8-14 - ज्ञान से भी शील की प्राथमिकता
8-16 - बहुत शास्त्रों का ज्ञान होते हुए भी शील ही उत्तम
8-17 - जो शील गुण से मंडित हैं, वे देवों के भी वल्लभ हैं
8-18 - शील सहित का मनुष्यभव में जीना सफल
8-19 - जितने भी भले कार्य हैं वे सब शील के परिवार हैं
8-20 - शील ही तप आदिक हैं
8-21 - विषयरूप विष महा प्रबल है
8-22 - विषय-रूपी विष से संसार में बारबार भ्रमण
8-23 - विषयों की आसक्ति से चतुर्गति में दु:ख
8-24 - विषयों को छोड़ने से कुछ भी हानि नहीं है
8-25 - सब अंगों में शील ही उत्तम है
8-26 - विषयों में आसक्त, मूढ़, कुशील का संसार में भ्रणम
8-27 - जो कर्म की गांठ विषय सेवन करके आप ही बाँधी है उसको सत्पुरुष तपश्चरणादि करके आप ही काटते हैं
8-28 - जो शील के द्वारा आत्मा शोभा पाता है उसको दृष्टान्त द्वारा दिखाते हैं
8-29 - जो शीलवान पुरुष हैं वे ही मोक्ष को प्राप्त करते हैं
8-30 - शील के बिना ज्ञान ही से मोक्ष नहीं है, इसका उदाहरण
8-31 - शील के बिना ज्ञान से ही भाव की शुद्धता नहीं होती है
8-32 - यदि नरक में भी शील हो जाय और विषयों में विरक्त हो जाय तो वहाँ से निकलकर तीर्थंकर पद को प्राप्त होता है
8-33 - इस कथन का संकोच करते हैं
8-34 - इस शील से निर्वाण होता है उसका बहुतप्रकार से वर्णन
8-35 - ऐसे अष्टकर्मों को जिनने दग्ध किये वे सिद्ध हुए हैं
8-36 - जो लावण्य और शीलयुक्त हैं वे मुनि प्रशंसा के योग्य होते हैं
8-37 - जो ऐसा हो वह जिनमार्ग में रत्नत्रय की प्राप्तिरूप बोधि को प्राप्त होता है
8-38 - यह प्राप्ति जिनवचन से होती है
8-39 - अंतसमय में सल्लेखना कही है, उसमें दर्शन ज्ञान चारित्र तप इन चार आराधना का उपदेश है
8-40 - ज्ञान से सर्वसिद्धि है यह सर्वजन प्रसिद्ध है वह ज्ञान तो ऐसा हो
जचंदछाबडा
!!
श्रीसर्वज्ञवीतरागाय नम:
!!
श्रीमद्-भगवत्कुन्दकुन्दाचार्य-देव-प्रणीत
श्री
अष्टपाहुड
मूल प्राकृत गाथा,
पं जयचंदजी छाबडा कृत हिंदी टीका और पंडित हुकम चंद भारिल्ल द्वारा हिंदी पद्यानुवाद सहित
आभार :
जचंदछाबडा
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