प्रभाचन्द्राचार्य
001 - मंगलाचरण
002 - आचार्य की प्रतिज्ञा
003 - धर्म का लक्षण
004 - सम्यग्दर्शन
005 - आप्त का लक्षण
006 - वीतराग का लक्षण
008 - आगम का लक्षण
009 - शास्त्र का लक्षण
010 - गुरु का लक्षण
011 - नि:शंकित अंग
012 - नि:कांक्षित अंग
013 - निर्विचिकित्सा अंग
014 - अमूढ़दृष्टि अंग
015 - उपगूहन अंग
016 - स्थितिकरण अंग
017 - वात्सल्य अंग
018 - प्रभावना अंग
019-020 - आठ अंगधारी के नाम
021 - अंगहीन सम्यक्त्व व्यर्थ है
022 - लोक मूढ़ता
023 - देव मूढ़ता
024 - गुरु मूढ़ता
025 - आठमद के नाम
026 - मद करने से हानि
027 - पाप त्याग का उपदेश
028 - सम्यग्दर्शन की महिमा
029 - धर्म और अधर्म का फल
030 - सम्यग्दृष्टि कुदेवादिक को नमन ना करे
031 - सम्यग्दर्शन की श्रेष्ठता
032 - सम्यग्दर्शन के बिना ज्ञान चारित्र की असम्भवता
033 - मोही मुनि की अपेक्षा निर्मोही गृहस्थ श्रेष्ठ
034 - श्रेय और अश्रेय का कथन
035 - सम्यग्दृष्टि के अनुत्पत्ति के स्थान
036 - सम्यग्दृष्टि जीव श्रेष्ठ मनुष्य होते हैं
037 - सम्यग्दृष्टि जीव इंद्र पद पाते हैं
038 - सम्यग्दृष्टि ही चक्रवर्ती होते हैं
039 - सम्यग्दृष्टि ही तीर्थंकर होते हैं
040 - सम्यग्दृष्टि ही मोक्ष-पद प्राप्त करते हैं
041 - उपसंहार
042 - सम्यग्ज्ञान का लक्षण
043 - प्रथमानुयोग
044 - करणानुयोग
045 - चरणानुयोग
046 - द्रव्यानुयोग
047 - चारित्र की आवश्यकता
048 - चारित्र कब होता है?
049 - चारित्र का लक्षण
050 - चारित्र के भेद और उपासक
051 - विकल चारित्र के भेद
052 - अणुव्रत का लक्षण
053 - अहिंसा अणुव्रत
054 - अहिंसा अणुव्रत के अतिचार
055 - सत्याणुव्रत
056 - सत्याणुव्रत के अतिचार
057 - अचौर्याणुव्रत
058 - अचौर्याणुव्रत के अतिचार
059 - ब्रह्मचर्य अणुव्रत
060 - ब्रह्मचर्याणुव्रत के अतिचार
061 - परिग्रह परिमाण अणुव्रत
062 - परिग्रह परिमाण अणुव्रत के अतिचार
063 - पंचाणु व्रत का फल
064 - पंचाणुव्रत में प्रसिद्ध नाम
065 - पांच पाप में प्रसिद्ध नाम
066 - श्रावक के आठ मूलगुण
067 - गुणव्रतों के नाम
068 - दिग्व्रत का लक्षण
069 - मर्यादा की विधि
070 - दिग्व्रती के महाव्रतपना
071 - सो कैसे ? उसका समाधान
072 - महाव्रत का लक्षण
073 - दिग्व्रत के अतिचार
074 - अनर्थदण्ड व्रत
075 - अनर्थदण्ड के भेद
076 - पापोपदेश का लक्षण
077 - हिंसादान अनर्थदण्ड
078 - अपध्यान अनर्थदण्ड
079 - दु:श्रुति अनर्थदण्ड
080 - प्रमादचर्या अनर्थदण्ड
081 - अनर्थदण्डव्रत के अतिचार
082 - भोगोपभोग परिमाण गुणव्रत
083 - भोग-उपभोग के लक्षण
084 - सर्वथा त्याज्य पदार्थ
085 - अन्य त्याज्य पदार्थ
086 - व्रत का स्वरूप
087 - यम और नियम
088-89 - भोगोपभोग सामग्री
090 - भोगोपभोग परिमाण व्रत के अतिचार
091 - शिक्षाव्रत
092 - देशावकाशिक शिक्षाव्रत
093 - देशव्रत में मर्यादा की विधि
094 - देशव्रत में काल मर्यादा
095 - यह व्रत भी उपचार से महाव्रत है
096 - देशावकाशिक व्रत के अतिचार
097 - सामायिक शिक्षाव्रत
098 - समय शब्द की व्युत्पत्ति
099 - सामायिक योग्य स्थान
100 - व्रत के दिन सामायिक का उपदेश
101 - प्रातिदिन सामायिक का उपदेश
102 - सामायिक के समय मुनितुल्यता
103 - परीषह / उपसर्ग सहन का उपदेश
104 - सामायिक के समय चिंतन
105 - सामायिक के अतिचार
106 - प्रोषधोपवास शिक्षाव्रत
107 - उपवास के दिन वर्जित कार्य
108 - उपवास के दिन कर्तव्य
109 - प्रोषध और उपवास का लक्षण
110 - प्रोषधोपवासव्रत के अतिचार
111 - वैयावृत्य का लक्षण
112 - वैयावृत्य का दूसरा लक्षण
113 - दान का लक्षण
114 - दान का फल
115 - नवधा भक्ति का फल
116 - अल्पदान से महाफल
117 - दान के भेद
118 - दानों में प्रसिद्ध नाम
119 - वैयावृत्य में अर्हंत पूजा
120 - पूजा का माहात्म्य
121 - वैयावृत्य के अतिचार
122 - सल्लेखना का लक्षण
123 - सल्लेखना की आवश्यकता
124-125 - सल्लेखना की विधि और महाव्रत धारण का उपदेश
126 - स्वाध्याय का उपदेश
127 - भोजन के त्याग का क्रम
128 - सल्लेखना में शेष आहार त्याग का क्रम
129 - सल्लेखना के पांच अतिचार
130 - सल्लेखना का फल
131 - मोक्ष का लक्षण
132 - मुक्तजीवों का लक्षण
133 - विकार का अभाव
134 - मुक्तजीव कहाँ रहते हैं ?
135 - सद्धर्म का फल
136 - ग्यारह प्रतिमा
137 - दर्शन प्रतिमा
138 - व्रत प्रतिमा
139 - सामायिक प्रतिमा
140 - प्रोषध प्रतिमा
141 - सचित्त त्याग प्रतिमा
142 - रात्रि भुक्ति त्याग प्रतिमा
143 - ब्रह्मचर्य प्रतिमा
144 - आरम्भ त्याग प्रतिमा
145 - परिग्रह त्याग प्रतिमा
146 - अनुमति त्याग प्रतिमा
147 - उद्दिष्ट त्याग प्रतिमा
148 - श्रेष्ठ ज्ञाता कौन है ?
149 - रत्नत्रय का फल
150 - इष्ट प्रार्थना
प्रभाचन्द्राचार्य
आर्यिका-आदिमति
001 - मंगलाचरण
002 - आचार्य की प्रतिज्ञा
003 - धर्म का लक्षण
004 - सम्यग्दर्शन
005 - आप्त का लक्षण
006 - वीतराग का लक्षण
008 - आगम का लक्षण
009 - शास्त्र का लक्षण
010 - गुरु का लक्षण
011 - नि:शंकित अंग
012 - नि:कांक्षित अंग
013 - निर्विचिकित्सा अंग
014 - अमूढ़दृष्टि अंग
015 - उपगूहन अंग
016 - स्थितिकरण अंग
017 - वात्सल्य अंग
018 - प्रभावना अंग
019-020 - आठ अंगधारी के नाम
021 - अंगहीन सम्यक्त्व व्यर्थ है
022 - लोक मूढ़ता
023 - देव मूढ़ता
024 - गुरु मूढ़ता
025 - आठमद के नाम
026 - मद करने से हानि
027 - पाप त्याग का उपदेश
028 - सम्यग्दर्शन की महिमा
029 - धर्म और अधर्म का फल
030 - सम्यग्दृष्टि कुदेवादिक को नमन ना करे
031 - सम्यग्दर्शन की श्रेष्ठता
032 - सम्यग्दर्शन के बिना ज्ञान चारित्र की असम्भवता
033 - मोही मुनि की अपेक्षा निर्मोही गृहस्थ श्रेष्ठ
034 - श्रेय और अश्रेय का कथन
035 - सम्यग्दृष्टि के अनुत्पत्ति के स्थान
036 - सम्यग्दृष्टि जीव श्रेष्ठ मनुष्य होते हैं
037 - सम्यग्दृष्टि जीव इंद्र पद पाते हैं
038 - सम्यग्दृष्टि ही चक्रवर्ती होते हैं
039 - सम्यग्दृष्टि ही तीर्थंकर होते हैं
040 - सम्यग्दृष्टि ही मोक्ष-पद प्राप्त करते हैं
041 - उपसंहार
042 - सम्यग्ज्ञान का लक्षण
043 - प्रथमानुयोग
044 - करणानुयोग
045 - चरणानुयोग
046 - द्रव्यानुयोग
047 - चारित्र की आवश्यकता
048 - चारित्र कब होता है?
049 - चारित्र का लक्षण
050 - चारित्र के भेद और उपासक
051 - विकल चारित्र के भेद
052 - अणुव्रत का लक्षण
053 - अहिंसा अणुव्रत
054 - अहिंसा अणुव्रत के अतिचार
055 - सत्याणुव्रत
056 - सत्याणुव्रत के अतिचार
057 - अचौर्याणुव्रत
058 - अचौर्याणुव्रत के अतिचार
059 - ब्रह्मचर्य अणुव्रत
060 - ब्रह्मचर्याणुव्रत के अतिचार
061 - परिग्रह परिमाण अणुव्रत
062 - परिग्रह परिमाण अणुव्रत के अतिचार
063 - पंचाणु व्रत का फल
064 - पंचाणुव्रत में प्रसिद्ध नाम
065 - पांच पाप में प्रसिद्ध नाम
066 - श्रावक के आठ मूलगुण
067 - गुणव्रतों के नाम
068 - दिग्व्रत का लक्षण
069 - मर्यादा की विधि
070 - दिग्व्रती के महाव्रतपना
071 - सो कैसे ? उसका समाधान
072 - महाव्रत का लक्षण
073 - दिग्व्रत के अतिचार
074 - अनर्थदण्ड व्रत
075 - अनर्थदण्ड के भेद
076 - पापोपदेश का लक्षण
077 - हिंसादान अनर्थदण्ड
078 - अपध्यान अनर्थदण्ड
079 - दु:श्रुति अनर्थदण्ड
080 - प्रमादचर्या अनर्थदण्ड
081 - अनर्थदण्डव्रत के अतिचार
082 - भोगोपभोग परिमाण गुणव्रत
083 - भोग-उपभोग के लक्षण
084 - सर्वथा त्याज्य पदार्थ
085 - अन्य त्याज्य पदार्थ
086 - व्रत का स्वरूप
087 - यम और नियम
088-89 - भोगोपभोग सामग्री
090 - भोगोपभोग परिमाण व्रत के अतिचार
091 - शिक्षाव्रत
092 - देशावकाशिक शिक्षाव्रत
093 - देशव्रत में मर्यादा की विधि
094 - देशव्रत में काल मर्यादा
095 - यह व्रत भी उपचार से महाव्रत है
096 - देशावकाशिक व्रत के अतिचार
097 - सामायिक शिक्षाव्रत
098 - समय शब्द की व्युत्पत्ति
099 - सामायिक योग्य स्थान
100 - व्रत के दिन सामायिक का उपदेश
101 - प्रातिदिन सामायिक का उपदेश
102 - सामायिक के समय मुनितुल्यता
103 - परीषह / उपसर्ग सहन का उपदेश
104 - सामायिक के समय चिंतन
105 - सामायिक के अतिचार
106 - प्रोषधोपवास शिक्षाव्रत
107 - उपवास के दिन वर्जित कार्य
108 - उपवास के दिन कर्तव्य
109 - प्रोषध और उपवास का लक्षण
110 - प्रोषधोपवासव्रत के अतिचार
111 - वैयावृत्य का लक्षण
112 - वैयावृत्य का दूसरा लक्षण
113 - दान का लक्षण
114 - दान का फल
115 - नवधा भक्ति का फल
116 - अल्पदान से महाफल
117 - दान के भेद
118 - दानों में प्रसिद्ध नाम
119 - वैयावृत्य में अर्हंत पूजा
120 - पूजा का माहात्म्य
121 - वैयावृत्य के अतिचार
122 - सल्लेखना का लक्षण
123 - सल्लेखना की आवश्यकता
124-125 - सल्लेखना की विधि और महाव्रत धारण का उपदेश
126 - स्वाध्याय का उपदेश
127 - भोजन के त्याग का क्रम
128 - सल्लेखना में शेष आहार त्याग का क्रम
129 - सल्लेखना के पांच अतिचार
130 - सल्लेखना का फल
131 - मोक्ष का लक्षण
132 - मुक्तजीवों का लक्षण
133 - विकार का अभाव
134 - मुक्तजीव कहाँ रहते हैं ?
135 - सद्धर्म का फल
136 - ग्यारह प्रतिमा
137 - दर्शन प्रतिमा
138 - व्रत प्रतिमा
139 - सामायिक प्रतिमा
140 - प्रोषध प्रतिमा
141 - सचित्त त्याग प्रतिमा
142 - रात्रि भुक्ति त्याग प्रतिमा
143 - ब्रह्मचर्य प्रतिमा
144 - आरम्भ त्याग प्रतिमा
145 - परिग्रह त्याग प्रतिमा
146 - अनुमति त्याग प्रतिमा
147 - उद्दिष्ट त्याग प्रतिमा
148 - श्रेष्ठ ज्ञाता कौन है ?
149 - रत्नत्रय का फल
150 - इष्ट प्रार्थना
आर्यिका-आदिमति
पं-सदासुखदास
001 - मंगलाचरण
002 - आचार्य की प्रतिज्ञा
003 - धर्म का लक्षण
004 - सम्यग्दर्शन
005 - आप्त का लक्षण
006 - वीतराग का लक्षण
007 - हितोपदेशी का लक्षण
008 - आगम का लक्षण
009 - शास्त्र का लक्षण
010 - गुरु का लक्षण
011 - नि:शंकित अंग
012 - नि:कांक्षित अंग
013 - निर्विचिकित्सा अंग
014 - अमूढ़दृष्टि अंग
015 - उपगूहन अंग
016 - स्थितिकरण अंग
017 - वात्सल्य अंग
018 - प्रभावना अंग
021 - अंगहीन सम्यक्त्व व्यर्थ है
022 - लोक मूढ़ता
023 - देव मूढ़ता
024 - गुरु मूढ़ता
025 - आठमद के नाम
026 - मद करने से हानि
027 - पाप त्याग का उपदेश
028 - सम्यग्दर्शन की महिमा
029 - धर्म और अधर्म का फल
030 - सम्यग्दृष्टि कुदेवादिक को नमन ना करे
031 - सम्यग्दर्शन की श्रेष्ठता
032 - सम्यग्दर्शन के बिना ज्ञान चारित्र की असम्भवता
033 - मोही मुनि की अपेक्षा निर्मोही गृहस्थ श्रेष्ठ
034 - श्रेय और अश्रेय का कथन
035 - सम्यग्दृष्टि के अनुत्पत्ति के स्थान
036 - सम्यग्दृष्टि जीव श्रेष्ठ मनुष्य होते हैं
037 - सम्यग्दृष्टि जीव इंद्र पद पाते हैं
पं-सदासुखदास
!!
श्रीसर्वज्ञवीतरागाय नम:
!!
श्रीमद्-भगवत्समन्तभद्राचार्य-देव-प्रणीत
श्री
रत्नकरण्ड श्रावकाचार
मूल संस्कृत गाथा,
प्रभाचंद्राचार्य कृत संस्कृत टीका और आदिमती माताजी कृत हिंदी टीका सहित
आभार :
प्रभाचन्द्राचार्य
आदिमति
सदासुखदास
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