पुरुमहदुदारुरालं, एयट्ठो संविजाण तम्हि भवं।
ओरालियं तमुच्चइ, ओरालियकायजोगो सो॥230॥
अन्वयार्थ : पुरु, महत्, उदार, उराल, ये सब शब्द एक ही स्थूल अर्थ के वाचक है। उदार में जो होय उसको कहते हैं औदारिक । औदारिक ही पुद्गल पिण्ड का संचयरूप होने से काय हैं। औदारिक वर्गणा के स्कन्धों का औदारिक कायरूप परिणमन में कारण जो आत्मप्रदेशों का परिस्पंद हैं, वह औदारिक काययोग है ॥230॥

  जीवतत्त्वप्रदीपिका