
क्कं समयपबद्धं बंधदि एक्कं उदेदि चरिमम्मि।
गुणहाणीण दिवह्नं, समयपबद्धं हवे सत्तं॥254॥
अन्वयार्थ : प्रतिसमय एक समयप्रबद्ध का बंध होता है और एक ही समयप्रबद्ध का उदय होता है तथा कुछ कम डेढ़ गुणहानिगुणित समयप्रबद्धों की सत्ता रहती हैं ॥254॥
जीवतत्त्वप्रदीपिका