आहारकायजोगा, चउवण्णं होंति एकसमयम्हि।
आहारमिस्सजोगा, सत्तावीसा दु उक्कस्सं॥270॥
अन्वयार्थ : एक समय में आहारककाययोग वाले जीव अधिक से अधिक चौवन होते हैं और आहारकमिश्रयोग वाले जीव अधिक से अधिक सत्ताईस होते हैं। यहाँ पर जो ।िंीर्ेीं;एक समय मेंङ्क तथा ।िंीर्ेीं;उत्कृष्ट शब्दङ्क है, वह मध्यदीपक है ॥270॥

  जीवतत्त्वप्रदीपिका