
सुहदु्नखसुबहुसस्सं, कम्म्नखेत्तं कसेदि जीवस्स।
संसारदूरमेरं, तेण कसाओ त्ति णं वेंति॥282॥
अन्वयार्थ : जीव के सुख-दु:खरूप अनेक प्रकार के धान्य को उत्पन्न करनेवाले तथा जिसकी संसाररूप मर्यादा अत्यन्त दूर है ऐसे कर्मरूपी क्षेत्र का यह कर्षण करता है, इसलिये इसको कषाय कहते हैं ॥282॥
जीवतत्त्वप्रदीपिका