
वेंजणअत्थअवग्गहभेदा हु हवंति पत्तपत्तत्थे।
कमसो ते वावरिदा, पढमं ण हि चक्खुमणसाणं॥307॥
अन्वयार्थ : अवग्रह के दो भेद हैं - व्यञ्जनावग्रह एवं अर्थावग्रह। जो प्राप्त अर्थ के विषय में होता है, उसको व्यञ्जनावग्रह कहते हैं और जो अप्राप्त अर्थ के विषय में होता है, उसको अर्थावग्रह कहते हैं और ये पहले व्यंजनावग्रह पीछे अर्थावग्रह इस क्रम से होते हैं । तथा व्यंजनावग्रह चक्षु और मन से नहीं होता ॥307॥
जीवतत्त्वप्रदीपिका