पज्जायावरणं पुण, तदणंतरणाणभेदम्हि॥319॥
अन्वयार्थ : सूक्ष्म निगोदिया लब्ध्यपर्याप्तक के जो सबसे जघन्य ज्ञान होता है उसको पर्याय ज्ञान कहते हैं। इसमें विशेषता केवल यही है कि इसके आवरण करनेवाले कर्म के उदय का ङ्कल इसमें (पर्याय ज्ञान में) नहीं होता, किन्तु इसके अनन्तर ज्ञान (पर्यायसमास) के प्रथम भेद में ही होता है॥319॥

  जीवतत्त्वप्रदीपिका