सुहमणिगोदअपज्जत्तयस्स जादस्स पढमसमयम्हि।
ङ्कासिंदियमदिपुव्वं सुदणाणं लद्धिअक्खरयं॥322॥
अन्वयार्थ : सूक्ष्मनिगोदिया लब्ध्यपर्याप्तक जीव के उत्पन्न होने के प्रथम समय में स्पर्शन इन्द्रियजन्य मतिज्ञानपूर्वक लब्ध्यक्षररूप श्रुतज्ञान होता है ॥322॥

  जीवतत्त्वप्रदीपिका