अंगुलअसंखभागे, पुव्वगवड्ढीगदे दु परवड्ढी।
एक्क वारं होदि हु पुणो पुणो चरिमउड्ढित्ती॥326॥
अन्वयार्थ : सूच्यंगुल के असंख्यातवें भागप्रमाण पूर्ववृद्धि हो जाने पर एक बार उत्तर वृद्धि होती है। यह नियम अंत की वृद्धि पर्यन्त समझना चाहिये। सूच्यंगुल के असंख्यातवें भाग बार अनंत भाग वृद्धि हो जाने पर एक बार असंख्यात भाग वृद्धि होती है। इसी क्रम से असंख्यात भाग वृद्धि भी जब सूच्यंगुल के असंख्यातवें भागप्रमाण हो जाए तब सूच्यंगुल के असंख्यातवें भागप्रमाण अनंत भाग वृद्धि होने पर एक बार संख्यात भाग वृद्धि होती है। इस ही तरह अंत की वृद्धि पर्यन्त जानना ॥326॥

  जीवतत्त्वप्रदीपिका