भवपच्चइगो सुरणिरयाणं तित्थे वि सव्वअंगुत्थो।
गुणप इगो णरतिरियाणं संखादिचिण्हभवो॥371॥
अन्वयार्थ : भवप्रत्यय अवधिज्ञान देव, नारकी तथा तीर्थंकरों के भी होता है और यह ज्ञान संपूर्ण अंग से उत्पन्न होता है। गुणप्रत्यय अवधिज्ञान पर्याप्त मनुष्य तथा संज्ञी पंचेन्द्रिय तिर्यंचों के भी होता है और यह ज्ञान शंखादि चिह्नों से होता है ॥371॥

  जीवतत्त्वप्रदीपिका