
णोकम्मुरालसंचं, मज्झिमजोगज्जियं सविस्सचयं।
लोयविभत्तं जाणदि, अवरोही दव्वदो णियमा॥377॥
अन्वयार्थ : मध्यम योग के द्वारा संचित विस्रसोपचय सहित नोकर्म औदारिक वर्गणा के संचय में लोक का भाग देने से जितना द्रव्य लब्ध आवे उतने को नियम से जघन्य अवधिज्ञान द्रव्य की अपेक्षा से जानता है। इससे छोटे स्कंध को वह नहीं जानता। इससे स्थूल स्कंध को जानने में कुछ बाधा नहीं है॥377॥
जीवतत्त्वप्रदीपिका