
अवरं होदि अणंतं, अणंतभागेण अहियमुक्कस्सं।
इदि मणभेदाणंतिमभागो दव्वम्मि धुवहारो॥387॥
अन्वयार्थ : मनोवर्गणा का जघन्य भेद अनंत प्रमाण है। अनंत परमाणुओं के स्कंधरूप जघन्य मनोवर्गणा है। उस प्रमाण को अनंत का भाग देने पर जो प्रमाण आता है, उतना उस जघन्य भेद के प्रमाण में जोड़ने पर जो प्रमाण हो, वही मनोवर्गणा के उत्कृष्ट भेद का प्रमाण जानना। इतने परमाणुओं के स्कंधरूप उत्कृष्ट मनोवर्गणा है। सो जघन्य से लेकर उत्कृष्ट तक पूर्वोक्त प्रकार से मनोवर्गणा के जितने भेद हुये, उनके अनंतवें भागमात्र यहाँ ध्रुवहार का प्रमाण है ॥387॥
जीवतत्त्वप्रदीपिका