
विउलमदी वि य छद्धा, उजुगाणुजुवयणकायचित्तगयं।
अत्थं जाणदि जम्हा, सद्दत्थगया हु ताणत्था॥440॥
अन्वयार्थ : विपुलमति के छह भेद हैं-ऋजु मन वचन काय के द्वारा किये गये परकीय मनोगत पदार्थों को विषय करने की अपेक्षा तीन भेद और कुटिल मन, वचन, काय के द्वारा किये हुए परकीय मनोगत पदार्थों को विषय करने की अपेक्षा तीन भेद। ऋजुमति तथा विपुलमति मन:पर्यय के विषय शब्दगत तथा अर्थगत दोनों ही प्रकार के होते हैं। कोई आकर पूछे तो उसके मन की बात मन:पर्ययज्ञानी जान सकता है। कदाचित् कोई न पूछे, मौनपूर्वक स्थित हो तो भी उसके मनस्थ विषय को वह जान सकता है ॥440॥
जीवतत्त्वप्रदीपिका