परमणसि ट्ठियमट्ठं, ईहामदिणा उजुट्ठियं लहिय।
पच्छा प च्च क्खेण य, उजुमदिणा जाणदे णियमा॥448॥
अन्वयार्थ : पर जीव के मन में सरलपने चिंतवनरूप स्थित जो पदार्थ, उसे पहले तो ईहा नामक मतिज्ञान से प्राप्त होकर ऐसा विचार करता है कि अरे ! इसके मन में क्या है ? पश्चात् ऋजुमति मन:पर्ययज्ञान से उस अर्थ को प्रत्यक्षपने से ऋजुमति मन:पर्ययज्ञानी जानता है, ऐसा नियम है ॥448॥

  जीवतत्त्वप्रदीपिका