
अट्ठण्हं कम्माणं, समयपवद्धं विविस्ससोवचयम्।
धुवहारेणिगिवारं, भजिदे विदियं हवे दव्वं॥453॥
अन्वयार्थ : विस्रसोपचय से रहित आठ कर्मों के समयप्रबद्ध का जो प्रमाण है उसमें एक बार ध्रुवहार का भाग देने से जो लब्ध आवे उतना विपुलमति के द्वितीय द्रव्य का प्रमाण होता है ॥453॥
जीवतत्त्वप्रदीपिका