गाउयपुधत्तमवरं, उक्कस्सं होदि जोयणपुधत्तं।
विउलमदिस्स य अवरं, तस्स पुधत्तं वरं खु णरलोयं॥455॥
अन्वयार्थ : ऋजुमति का जघन्य क्षेत्र गव्यूतिपृथक्त्व-दो तीन कोस और उत्कृष्ट योजनपृथक्त्व - सात आठ योजन है। विपुलमति का जघन्य क्षेत्र पृथक्त्वयोजन - आठ नव योजन तथा उत्कृष्ट क्षेत्र मनुष्यलोक प्रमाण है ॥455॥

  जीवतत्त्वप्रदीपिका