दुग-तिगभवा हु अवरं, सत्तट्ठभवा हवंति उक्कस्सं।
अड-णवभवा हु अवरमसंखेज्जं विउलउक्कस्सं॥457॥
अन्वयार्थ : काल की अपेक्षा से ऋजुमति का विषयभूत जघन्य काल अतीत और अनागत दो तीन भव तथा उत्कृष्ट सात आठ भव है। इसी प्रकार विपुलमति का जघन्य काल अतीत और अनागत आठ नौ भव तथा उत्कृष्ट पल्य के असंख्यातवें भागप्रमाण भव हैं ॥457॥

  जीवतत्त्वप्रदीपिका