
पंचसमिदो तिगुत्तो, परिहरइ सदा वि जो हु सावज्ज।
पंचेक्कजमो पुरिसो, परिहारयसंजदो सो हु॥472॥
अन्वयार्थ : जो पाँच समिति और तीन गुप्तियों से युक्त होकर सदा ही हिंसा रूप सावद्य का परिहार करता है, वह सामायिक आदि पाँच संयमों में से परिहारविशुद्धि नामक संयम को धारण करने से परिहारविशुद्धि संयमी होता है ॥472॥
जीवतत्त्वप्रदीपिका