जोगपउत्ती लेस्सा, कसायउदयाणुरंजिया होई।
तत्तो दोण्णं कज्जं, बंधचउक्कं समुद्दिट्ठं॥490॥
अन्वयार्थ : मन, वचन, कायरूप योगों की प्रवृत्ति वह लेश्या है। योगों की प्रवृत्ति कषायों के उदय से अनुरंजित होती है। इसलिये योग और कषाय इन दोनों का कार्य चार प्रकार का बंध कहा है। योगों से प्रकृतिबंध और प्रदेशबंध कहा है। कषायों से स्थितिबंध और अनुभागबंध कहा है ॥490॥

  जीवतत्त्वप्रदीपिका