णिरया किण्हा कप्पा, भावाणुगया हु तिसुरणरतिरिये।
उत्तरदेहे छक्कं, भोगे रविचंदहरिदंगा॥496॥
अन्वयार्थ : सभी नारकी कृष्णवर्ण ही हैं। कल्पवासी देवों की जैसी भावलेश्या है, वैसे ही वर्ण के वे धारक हैं। पुनश्च; भवनवासी, व्यंतर, ज्योतिषी देव, मनुष्य, तिर्यंच तथा देवों का विक्रिया से बना शरीर, वे छहों वर्ण के धारक हैं। पुनश्च; उत्तम, मध्यम, जघन्य भोगभूमि संबंधी मनुष्य और तिर्यंच अनुक्रम से सूर्यसमान, चन्द्रसमान और हरित वर्ण के धारक हैं ॥496॥

  जीवतत्त्वप्रदीपिका