जीवतत्त्वप्रदीपिका
असुहाणं वरमज्झिमअवरंसे किण्हणीलकाउतिए।
परिणमदि कमेणप्पा, परिहाणीदो किलेसस्स॥501॥
अन्वयार्थ :
कृष्ण, नील, कापोत इन तीन अशुभ लेश्याओं के उत्कृष्ट, मध्यम, जघन्य अंशरूप में यह आत्मा क्रम से संक्लेश की हानिरूप से परिणमन करता है ॥501॥
जीवतत्त्वप्रदीपिका