
संकमणे छट्ठाणा, हाणिसु वड्ढीसु होंति तण्णामा।
परिमाणं च य पुव्वं, उत्तकमं होदि सुदणाणे॥506॥
अन्वयार्थ : संक्रमणाधिकार में हानि और वृद्धि दोनों अवस्थाओं में षट्स्थान होते हैं। इन षट्स्थानों के नाम तथा परिमाण पहले श्रुतज्ञानमार्गणा में जो कहे हैं वे ही यहाँ पर भी समझना ॥506॥
जीवतत्त्वप्रदीपिका