
उवहीणं तेत्तीसं, सत्तर सत्तेव होंति दो चेव।
अट्ठारस तेत्तीसा, उक्कस्सा होंति अदिरेया॥552॥
अन्वयार्थ : उत्कृष्ट काल कृष्णलेश्या का तैतीस सागर, नीललेश्या का सत्रह सागर, कापोतलेश्या का सात सागर, पीतलेश्या का दो सागर, पद्मलेश्याका अठारह सागर, शुक्ललेश्या का तैतीस सागर है। छहों लेश्याओं में यह काल कुछ अधिक-अधिक होता हैं, जैसे - कृष्णलेश्या का तैतीस सागर से कुछ अधिक, नीललेश्या का सत्रह सागर से कुछ अधिक, इत्यादि ॥552॥
जीवतत्त्वप्रदीपिका