
सगसगअवहारेहिं, पल्ले भजिदे हवंति सगरासी।
सगसगगुणपणिवण्णे, सगसगरासीसु अवणिदे वामा॥641॥
अन्वयार्थ : अपने-अपने भागहार का पल्य में भाग देने से अपनी-अपनी राशि के जीवों का प्रमाण निकलता है। तथा अपनी-अपनी सामान्य राशि में से असंयत, मिश्र, सासादन तथा देशव्रत का प्रमाण घटाने से अवशिष्ट मिथ्यादृष्टि जीवों का प्रमाण रहता है ॥641॥
जीवतत्त्वप्रदीपिका