
ओरालं पज्जत्ते, थावरकायादि जाव जोगो त्ति।
तम्मिस्समपज्जत्ते, चदुगुणठाणेसु णियमेण॥680॥
अन्वयार्थ : औदारिककाययोग, स्थावर एकेन्द्रिय पर्याप्त मिथ्यादृष्टि से लेकर सयोगी पर्यन्त होता है और औदारिक मिश्रकाययोग नियम से चार अपर्याप्त गुणस्थानों में ही होता है। औदारिककाययोग में पर्याप्त सात जीवसमास होते हैं और मिश्रयोग में अपर्याप्त सात जीवसमास हैं ॥680॥
जीवतत्त्वप्रदीपिका