छट्ठोत्ति पढमसण्णा, सकज्‍ज सेसा य कारणावेक्खा।
पुव्वो पढमणियट्ठी, सुहुमोत्ति कमेण सेसाओ॥702॥
अन्वयार्थ : मिथ्यात्व गुणस्थान से लेकर प्रमत्तपर्यन्त आहार, भय, मैथुन और परिग्रह ये चारों ही संज्ञाएँं कार्यरूप होती हैैं। किन्तु इसके ऊपर अप्रमत्त आदि में जो तीन आदिक संज्ञा होती हैैं वे सब कारण की अपेक्षा से ही बताई हैं, कार्यरूप नहीं हुआ करती। संज्ञाओं के कारणभूत कर्मों के अस्तित्व की अपेक्षा से ही वहाँ पर वे संज्ञाएँ मानी गई है। छठे गुणस्थानपर्यन्त आहारसंज्ञा, अपूर्वकरण पर्यन्त भयसंज्ञा, अनिवृत्तिकरण के प्रथम सवेदभागपर्यन्त मैथुन संज्ञा एवं सूक्ष्मसांपराय पर्यन्त परिग्रह संज्ञा होती है॥702॥

  जीवतत्त्वप्रदीपिका