सिद्धांत-बोधिनी
001 - मंगलाचरण
002 - जीव में प्रथमोपशम सम्यग्दर्शन को प्राप्त करने की योग्यता बताते है
003 - जीव के सम्यक्त्वोत्पत्ति से पूर्व मिथ्यात्व गुणस्थान में होने वाली पांच लब्धियां
004 - क्षयोपशम लब्धि का स्वरुप
005 - विशुद्धि लब्धि का स्वरूप
006 - देशना लब्धि का स्वरुप
007 - प्रायोग्य लब्धि का स्वरुप
008 - प्रथमोपशम सम्यक्त्व ग्रहण करने की योग्यता का प्रतिपादन
009 - प्रथमोपशम सम्यक्त्व के अभिमुख हुए जीव के स्थिति बंध योग्य परिणाम निम्न सूत्र में बताये गए है
010 - प्रायोग्य-लब्धि काल में प्रकृति-बंधापसरण
011-015 - चौतीस प्रकृति बन्धापसरणों (व्युच्छेद) का ५ गाथाओं में वर्णन
016-017-018 - नर, तिर्यंच और देवगति में, रत्नादि ६ पृथिवियों और सनत्कुमार आदि दश कल्पों में और आनतकल्प आदि में बंधपसरणों के निर्देश -
019 - सातवे नरकपृथिवी में बन्धापसरण
020 - मनुष्य और तिर्यंचगति में प्रथमोपशम सम्यक्त्व के अभिमुख मिथ्यादृष्टि जीव के द्वारा बध्यमान प्रकृतिया
021 - अप्रमत्त गुणस्थान में बंधने वाली २८ प्रकृतियाँ
022 - प्रथमोपशसम्यक्तव के अभिमुख देव और नारकी (छट्टी पृथिवी तक) द्वारा बढ़ी कर्म प्रकृतियाँ
023 - सातवी पृथ्वी के नारकी द्वारा बंध प्रकृतियाँ
024 - सम्यक्त्व के अभिमुख मिथिदृष्टि जीव के स्थिति-अनुभाग बंध के भेद
025 - सम्यक्त्व के अभिमुख मिथिदृष्टि जीव के प्रदेशबंध के विभाग
027 - उक्त तीन महादण्डकों में अपुनरुक्त प्रकृतियाँ
028 - प्रथमोपशम सम्यक्त्व के अभिमुख विशुद्ध मिथ्यादृष्टि के प्रकृति-स्थिति अनुभाग और प्रदेशों का उदय
029-030 - प्रथमोपशम सम्यक्त्व के अभिमुख विशुद्ध मिथ्यादृष्टि के उदय प्रकृति संबंधी स्थिति, अनुभाग तथा प्रदेशों की उदय-उदीरणा का कथन
31 - प्रकृतियों के सत्त्व का कथन
32 - सत्त्व प्रकृतियों के स्थिति-अनुभाग और प्रदेश बंध
33 - पंचम-करण लब्धि
34 - तीनों करणों का काल अल्पबहुत्व सहित
35 - प्रथम करण को अध:करण कहने का कारण
36 - अपूर्वकरण और अनिवृत्तिकरण के स्वरुप का निरूपण
37 - अध:प्रवृत्तकरण संबंधी विशेष (निम्न ५ गाथा) कथन
42 - अध: प्रवृत्त करण संबंधी अनुकृष्टि एवं अल्पबहुत्व अनुयोग-द्वार
सिद्धांत-बोधिनी
!!
श्रीसर्वज्ञवीतरागाय नम:
!!
श्रीमद्-नेमिचंद्र-आचार्यदेव-प्रणीत
श्री
लब्धिसार
मूल प्राकृत गाथा,
आभार :
बोधिनी
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